श्री स्वामी विवेकानंद का राष्ट्र को आवाहन
श्री स्वामी विवेकानंद का राष्ट्र को आवाहन
उनके नव-वैदांतिक दर्शन
से मानव जीवन का उद्देश्य लेकर उन्होंने पूरे राष्ट्र को आवाहन करते हुए कहा है कि
मानव जीवन का उद्देश्य सार्थक, निस्स्वार्थ और सेवा-भाव वाला होना चाहिए। हमारा जीवन केवल एक अस्तित्व ही नहीं बल्कि दूसरों
की मदद करने और उनकी सेवा करने वाला व्यतीत होना चाहिए। एक सार्थक जीवन वही कहलाता
है जो मनुष्य के भीतर विकसित होने के साथ बाहर दूसरों के जीवन को भी विकसित किया
जा सके। स्वामी जी के अनुसार एक अच्छे राष्ट्र का निर्माण व्यक्ति के सुचरित्र
निर्माण से शुरु होता है। राष्ट्र में नागरिकों का चरित्र व्यक्तित्व विकास
निर्माण के साथ राष्ट्र के विकास का भी महत्त्वपूर्ण भाग है। उनके अनुसार राष्ट्र
महान और बेहतर बनाने के लिए सभी नागरिकों को उज्ज्वल चरित्र वाहक बनना होगा। अपने
चरित्र और राष्ट्र को महान बनाने के लिए चार पहलुओं का होना बहुत जरूरी हैं जो कि
नागरिकों के शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक,
सामाजिक राष्ट्रीयता और आध्यात्मिक से सम्बंधित है।
राष्ट्र के नागरिकों
में शारीरिक शक्ति और स्वास्थ्य अनुकूल होना बहुत जरूरी हैं। वही मानव व्यक्तित्व
का मूलभूत आधार है। अपने दैनिक जीवन में शारीरिक गतिविधियाँ और खेलों को शामिल
करके स्वस्थ रहने के लिए प्रोत्साहित करना होगा। मानव व्यक्तित्व के विकास के लिए
योग-साधना भारतीय परम्पराओं को अमूल्य उपहार है जो शरीर और मन की एकता के विकास का
प्रतीक है। शारीरिक रूप से स्वस्थ के अलावा स्वामी जी यह भी आवाहन करते हैं कि
नागरिक बौद्धिक और मानसिक रूप से परिपक्व और रचनात्मक होना चाहिए। ब्रह्मांड की
सारी शक्तियों का उपयोग करके अपने मन और शरीर को अनुचित रूप से बड़ी से बड़ी
कठिनाइयों का सामना किया जा सकता है। विवेकानंद जी ने हमेशा ही कहा है कि एक विचार
आत्मसात करो, उस विचार को व्यक्त करो, उसे
चिंतन करो और उसके अनुसार जीवन व्यापन करो। आप कर्म योगी तभी हो सकते हैं जब जीवन
के प्रत्येक क्षण पर विचार केंद्रित किया जाए और अपना मन उन चुने हुए विचारों के
प्रवाह में लीन हो जाए तब जीवन में सफलता आसानी से प्राप्त होगी।
राष्ट्र सेवा को प्रमुख
कर्तव्य मानकर स्वामी विवेकानंद जी का सुझाव यह है कि देशवासियों, अधिकारियों और नेताओं ने राष्ट्रवाद के पुनरुत्थान के लिए शारीरिक,
बौद्धिक एवं आध्यात्मिक रूप से बलवान होना चाहिए। राष्ट्र के युवाओं
के रक्त में जोश, नसों में ताकत, लोहे
जैसी मांसपेशियाँ और विचारों में नम्रता होनी चाहिए। यदि राष्ट्र को सक्षम बनाना
है तो महान कार्य करो। कोई भी महान और अस्तित्व पूर्ण कार्य करने से मत डरो। निडर
होकर अपने कर्म पर विश्वास रखो और अपने भीतर की दिव्यता को व्यक्त करो। जब तक अपने
लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर लेते तब तक प्रयत्नशील रहो। उचित राष्ट्र निर्माण के
लिए अपनी क्षमता का उपयोग करो तथा संस्कृति का उत्थान करो जिससे बौद्धिक कौशल
विकसित होगा और शिक्षा के मूल्यों को आत्मसात करके राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली से
सम्पूर्ण देश की आध्यात्मिकता और धर्मनिरपेक्षता क्रिया कल्प हमारे हाथों से ही
उच्च स्तर पर होगी।
आध्यात्मिक राष्ट्रवाद
के विचार से स्वामी विवेकानंद जी ने आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद से राष्ट्रीय जन जागृति
का मुख्य मार्ग बताया है। उनका मानना था कि राष्ट्र में धर्म स्थिरता और राष्ट्रीय
एकता के लिए रचनात्मक और आध्यात्मिकता के साथ विविध धार्मिक होने के बावजूद एक
सक्षम अभिसरण बिंदु होना चाहिए। वे राष्ट्र को आवाहन करते हुए घोषणा करते है कि
धर्म शक्ति का सार है और गरीबों, दलितों, बीमारों और अज्ञानियों में भगवान को देखना और उनकी सेवा करना राष्ट्रीय
एकीकृत का सबसे सच्चा और अच्छा उदाहरण है।
स्वामी जी के अनुसार
राष्ट्रवाद और सार्वभौमिकता शांतिपूर्ण सीमाओं तक ही सीमित नहीं होना चाहिए।
प्रत्येक राष्ट्र को अपने आप में पूर्णता का आचरण करने के लिए एक मिशन होना चाहिए
और उसे समझने के लिए अच्छी नियति और आपसी सद्भाव योगदान भी जरूरी हैं। राष्ट्र के
विकास के उद्देश्य से स्वामी जी कहना चाहते हैं कि आदर्श विचारों के साथ एक आधुनिक
और मजबूत आत्मनिर्भर शक्ति होनी चाहिए जो भौतिक समृद्धि शिक्षा और मानव जीवन की आय
में सुधार ला सके। तभी राष्ट्र एक विश्व गुरु के रूप में उचित मार्ग का अनुसरण
करके राष्ट्रवाद वसुदेवः कुटुम्ब-कम का सिद्धांत अनुसरित कर सकता है।
स्वामी विवेकानंद जी
भारतीय दर्शन और आध्यात्मिक जीवन के विश्व चेतना के रूप में कीर्ति पुरुष माने
जाते हैं। उनके मुखमंडल में इतना तेज था कि विद्यमान महासागर जैसी जिज्ञासाओं का
साहित्य संजीवन प्रस्तुत होता था। अपने मानसिक वैचारिक गुणों से भारत ही नहीं
अपितु पूरे विश्व में नव-जीवन, नई सोच, नई दिशा पर काम करते हुए गौरवशाली ज्ञान गरिमा जैसा राष्ट्र चेतना का
संचार कर आवाहन किया है। प्रेरणा पुरुष स्वामी जी ने राष्ट्र चेतना को जागृत करते
हुए ज़ुल्म-शोषण, अन्याय से दुखी भारतवासियों को नई दिशा
दिखाते हुए अध्यात्म ज्ञान और आत्मशक्ति से आत्मबल को मजबूत बनाने का कार्य किया
है।
स्वामी जी ने रूढ़िवाद
विचारों, अंधविश्वासों को छोड़ने, पराधीनता
को त्यागने का हमेशा राष्ट्र को आवाहन किया है। देशवासियों में स्वाभिमान को जगाते
हुए भारतीय, वेदांत दर्शन और आध्यात्मिकता का पूरे विश्व में
डंका बजाया है। उन्होंने युवाओं और शैक्षणिक संस्थानों से यथार्थ को दर्शाते हुए कहा
है कि चिंतन-मनन, आध्यात्मिकता, संस्कार
से राष्ट्र चेतना की जिज्ञासा जागृत करो। अपनी सभ्यताओं को विकसित कर चरितार्थ करो,
मानव धर्म का आधार बनो तथा सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करो।
राष्ट्र के प्रति प्रेम को दिखाते हुए युवाओं से कहा कि अपने ध्येय का पूर्ण
संकल्प करो और उसे पाने क लिए समर्पण करना जरूरी हैं। आगे इसी संदर्भ में वह कहते
हैं कि हमें पश्चिमी सभ्यता से मुक्त होना है पर उनसे बहुत कुछ सीखना है जो अच्छी
बात हो, नैतिकता, कर्मण्यता को ध्यान
में रखते हुए उपनिषद ज्ञान भंडार का अनुसरण करो और हमारे राष्ट्र की पहचान पूरे
विश्व में स्थापित करो।
एक समय देश की हालत
बड़ी जर्जर थी उस परिस्थिति को अनुकूल करते हुए उन्होंने ने लिखा था विधर्मी लोगों
के दमन चक्र में पिसकर अपनी चेतना को मन खोना। अगर सत्य का साथ हो असत्य अपने आप
मिट जाएगा। हमारे पुराने ग्रंथों के आध्यात्मिक ज्ञान को प्रकाश में लाओ। उनके
विचारों की प्रासंगिकता कितनी सटीक और सार्थक थी और आज समाज की राजनीति में स्पष्ट
देखी जा सकती हैं। स्वामी जी शिक्षा से संदर्भित राष्ट्र को आवाहन करते हुए कहा था
कि शिक्षा में सुचरित्र निर्माण करने की शक्ति होती हैं तथा लौकिक परमार्थ और
आवश्यकता को सुधारने का मिश्रण शिक्षा का द्वारा ही हो सकता है। राष्ट्र उत्थान का अलख जगाने के लिए आत्म
निरीक्षण करके कठिनाइयों का निर्भीकता से सामना करते हुए आदर्श स्थापित करने के
लिए कहा गया है।
जिस समय देश में
राजनीतिक एकता का अभाव था उस समय स्वामी जी ने अखिल भारतीय के विचारों को
राष्ट्रीयता और संरक्षण के स्वरूप में विदेशी आक्रांताओं को भारतीय संस्कृति का महत्व
और उद्देश्य समझाने की चेष्टा की है। अपने राष्ट्रवादी विचारों का विश्लेषण करते
हुए उन्होंने ऐसे-ऐसे ग्रंथों का प्रणयन किया है कि जिसमें राष्ट्रवाद का सीधा
व्याख्यान पढ़ने मिलता है। उन्होंने सभी को आवाहन करते हुए कहा था कि विकास का
दूसरा नाम स्वाधीनता है और स्वाधीनता के साथ सेवा करना सौभाग्य और पूजन की बात है।
उन्होंने मनुष्य को अपने विचारों से स्वतंत्र होने की मांग की है। सभी जाति,
पंथ, समाज, राष्ट्र का
विकास बिना किसी रोडे के होना चाहिए। विकास ही राष्ट्रवाद का परिचायक है। राष्ट्र
की सभी समस्याओं का समाधान केवल आध्यात्मिकता है। वास्तव में मनुष्य भेद-भाव ही
समस्याओं का मूल है दरिद्र, अपंग, नाई,
लोहार, चमार, धोबी सभी
लोग भारतीय ही है इसलिए सभी से प्रेम करो, सभी की सेवा करो।
गाँव-गाँव जाकर एक दूसरों को यह समझाना बहुत जरूरी है। दरिद्रता और अज्ञान के गर्त
में डुबे हुए उन सभी राष्ट्र के भविष्य के लोगों को अनुभव कराना होगा। वही महात्मा
बन सकता है जो दूसरों के दुखो को अनुभव करें और दूसरों के दुख के लिए स्वयं के
हृदय में टीस होती हो। परंतु अपने आत्मसम्मान की हमेशा रक्षा करना। अपने धर्म और
संस्कृति पर मर्मान्तक प्रहार न होने देना। जिस संस्कृति का राष्ट्रीय सम्मान
समाप्त होगा वह पुनः जागृत करो। उसमें एक विलक्षण शक्ति का निर्माण करो। हम सब कुछ
कर सकते हैं। हम सर्वशक्तिमान प्रभु की संतान है। ब्रह्मा की उन्नत चिनगारी है।
इसी आत्मविश्वास की प्रेरणा शक्ति से सभ्यता की ऊंची सीढ़ी चढ़ी जा सकती हैं।
पूर्ण संसार को हमारी जरूरत है। उत्साह की आग हमारी जन्मभूमि में है। हमारे
विश्वास की शक्तियों से सम्पूर्ण संसार को सबल राष्ट्रीयता का प्रमाण दिया जा सकता
है।
स्वामी जी राष्ट्रवाद
संकीर्ण नहीं था बल्कि वह तो दूसरे राष्ट्रों के प्रेरणा प्रदान करने वाले था।
अपने राष्ट्र को ऊंचा उठाने के लिए उत्सुक करने वाला था। उनका राष्ट्रवाद हमेशा
अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाना वाला था। अंतरराष्ट्रीय भावों को विकसित करने हेतु
स्वामी जी ने शिक्षा देकर राष्ट्रीय गौरव को विकसित करने का उद्देश्य रखा था।
राष्ट्र के कल्याण के लिए उन्होंने अपने आप को राजनीति में कभी नहीं उलझाया था।
लेकिन राष्ट्रवादी आंदोलन और राष्ट्रवादीयो के लिए राष्ट्र चेतना की लहर के प्रतीक
जरूर बने। जहाँ भारत आध्यात्मिक आभा से अभिभूत है वही स्वामी जी को अंधविश्वास से
बहुत तिरस्कार था। वह अपनी संस्कृति का आत्मलोचन करते थे परंतु भारत के पतन और दारिद्र्य
का कारण अंधविश्वास होने पर उन्हें दुख होता है। उन्होंने अपने राष्ट्र को
परिपूर्ण बनाने के लिए परराष्ट्र में जाकर ज्ञान का आदान-प्रदान करने का आवाहन
किया है। उनके विचार से आदान-प्रदान ही अभ्युदय का रहस्य है। हमें आदान परराष्ट्र
के कल-कारखानों के काम सीखना चाहिए और प्रदान में हमारे धर्म और संस्कृति की
महत्त्वतता को समझाना होगा। जो हमारी आध्यात्मिकता है उसे संसार की सर्वांगीण
सभ्यता का मान देकर संकीर्णता की दीवार को गिराना होगा।
भारतीय संस्कृति के प्रखर मनीषी ज्ञाता राष्ट्र चेतना जगाने वाले महान स्वामी विवेकानंद जी को जब चिंतन मनन करते हुए दिशा बोध का ज्ञान और प्रेरणा मिली तब उन्होंने पाश्चात्य जगत को भारतीय दर्शन का आध्यात्मिक ज्ञान देकर पूरे विश्व को चकित कर दिया था। उनके समाज सुधार के कार्य समाज की थाती है उनके द्वारा साझा राष्ट्र चेतना की आग देश के इतिहास का अहम दिखाता है। निस्संदेह तेजस्वी आध्यात्मिक ज्ञान के ज्ञाता स्वामी जी भारत की आठ विभूतियों में से एक है। उनकी राष्ट्रीयता, क्रांतिकारी विचार और युवा पीढ़ी को राष्ट्र के आवाहन एवं मार्गदर्शक के रूप में उनकी तेजस्वी वाणी, व्यक्तित्व, चारित्रिक दृढ़ता अविस्मरणीय है।
सूर्यकांत सुतार ‘सूर्या’
surya.4675@gmail.com
+255 712491777
हिंदी साहित्य के गुरुजनों से सीख जारी। कविता
संग्रह और गीत-गजल की पुस्तक प्रकाशित। भारत सरकार राज भाषा विभाग की पत्रिकाओं
में आलेख प्रकाशित। विभिन्न पत्रिकाएं एवं साझा काव्य संकलन में रचनाएँ प्रकाशित।
आद. रमेश पोखरियाल–मातृभूमि के लिए, बसंत
चौधरी–वक़्त रुकता नहीं, डॉ. मधु
सन्धु–सतरंगो स्वप्नों के शिखर पुस्तक पर पुस्तक समीक्षा। विभिन्न साहित्यिक
संस्थानों और मंचों से सम्मानित एवं पुरस्कृत।

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