डॉ. रामदरश मिश्र की साहित्यिक जीवन यात्रा

 डॉ. रामदरश मिश्र की साहित्यिक जीवन यात्रा



जिनके साहित्य में ग्रामीण भारत की समस्याएँ, अपनो के दर्द, सामंतीय आचरण, दरिद्रता, गरीबी, मान-अपमान, अपने अहम पर जीता समुदाय और भूख से विवश होते दलित और वंचित समाज का दर्शन होता है ऐसे साहित्यकार की पाठनीयता कभी आँखों से ओझल नहीं हो सकती। इनकी रचनाओं में भारतीय देहात का महासागर होता है और एक विश्वसनीय सुपरिचित आंदोलन तैयार होता है जो समय के गुजरे शोर-शराबे, अनुभव, बोध और रुपबंध के स्तर पर वैविध्यपूर्ण विधाओ को रचनात्मकता का रूप देकर साहित्यिक जगत में समृद्ध करते हैं। इनको महान साहित्यकार रेणू और प्रेमचंद के बाद की पीढी के रचनाकार के ख्याति प्राप्त है। हम बात कर रहे हैं हिन्दी जगत के सुप्रसिद्घ साहित्यकार डॉ रामदरश मिश्र जी की। अपने उम्र की ९९ वर्ष के पड़ाव के बाद भी मिश्र जी का व्यक्तित्व तेजोमय और वाणी में संघर्ष का ओज दिखाई पड़ता है।

डॉ॰ रामदरश मिश्र का जन्म १५ अगस्त १९२४ को गोरखपुर के कछार जिले के अंचल प्रांत के डुमरी गाँव में हुआ। उस वक्त उनका गाँव पिछडे गांवों की सूची में आता था। यह गाँव राप्ती और गौरी नदी के बीच स्थित है इसलिए यहाँ बाढग्रस्त गाँव ही घोषित किया गया है। माँ बाप, दो भाई बहनों के साथ इनका परिवार सात लोगों के साथ यहाँ बसता था। इनके पिता का नाम रामचंद्र मिश्र और माता का नाम कंबलपाती था। पिता स्वछंदती स्वभाव के होने के साथ-साथ अच्छे लठैत भी थे। उनका स्वभाव भोला भाला और भावुक था जिसकी वजह से वे कही भी कभी ही बिना सोचे समझे दूसरों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। माता जी बहुत ही कर्मठ और परिश्रमी थी। वह धार्मिक प्रवृत्ति की होने की वजह से उन्हें संगीत और गायन में विशेष रुचि थी उन्हें सांस्कृतिक अनुष्ठानों में विविध विधानों के साथ-साथ कथाओं का भी ज्ञान था। वही गुण डॉ॰ रामदरश मिश्र में दिखाई पड़ता है।

डॉ॰ रामदरश मिश्र की पहली शादी सन १९४१ में हुई थी परंतु दुर्भाग्यवश उनकी पत्नी का देहांत हो गया और तब उन्होने सन १९४५ में दूसरी शादी सरस्वती देवी से की जिससे उन्हें तीन पुत्र और दो सुपुत्री हुई है। मिश्र जी का पूरा परिवार सुसंस्कृत और संस्कारमय और मेहनती है। इनकी पत्नी मानवीय संवेदनायुक्त है जिनकी वजह से ही मिश्र जी इतना लिख-पढ़ पा रहे हैं। अपने परिवार को उन्होंने पूरी तरह से देशी संस्कार दिए हैं जो आधुनिकता को भी स्वीकार करते हुए खुलेपन, मैत्रीभाव और अपनापन अपनाते हैं।

डॉ॰ रामदरश मिश्र जी की प्रारंभिक शिक्षा मिडिल स्कूल तक गाँव के पास के एक स्कूल में हुई। फिर उन्होंने ढरसी गाँव स्थित 'राष्ट्रभाषा विद्यालय' से विशेष योग्यता बरहज से 'विशारद' और साहित्यरत्न की परीक्षाएँ पास की। १९४५ में ये वाराणसी चले गये और वहाँ एक प्राइवेट स्कूल में साल भर मैट्रिक की पढ़ाई की। मैट्रिक पास करने के पश्चात ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से जुड़ गये और वहीं से इंटरमीडिएट, हिन्दी में स्नातक एवं स्नातकोत्तर तथा डॉक्टरेट किया। सन् १९५६ में सयाजीराव गायकवाड़ विश्वविद्यालय, बड़ौदा में प्राध्यापक के रूप में उनकी नियुक्ति हुई। सन् १९५८ में ये गुजरात विश्वविद्यालय से सम्बद्ध हो गये और आठ वर्ष तक गुजरात में रहने के पश्चात १९६४ में दिल्ली विश्वविद्यालय में आ गये। वहाँ से १९९० में प्रोफेसर के रूप में सेवामुक्त हुए।

डॉ॰ रामदरश मिश्र जी हिन्दी साहित्य के प्रतिभावंत साहित्यकार है। बचपन से ही साहित्य के प्रति रुचि होने की वजह से आयु की १५-१६ वर्ष से ही उन्होंने कविता लिखना शुरू कर दिया था। मूल रूप से देहाती होने की वजह से गाँव के प्रचलित लोग गीतों को अपनी लेखनी का स्रोत बनाते हुए कविताओं कि रचना की। उनकी रचनाओं में गाँव की स्थिति, त्यौहार, परम्पराएँ, संस्कृति इत्यादि का हू-ब-हू यथार्थ चित्रण पढ़ने मिलता है। अपनी जीविका के लिए मिश्र जी को गाँव छोड़कर शहर की तरफ आना पड़ा। शहरी जीवन को करीब से देखने के बाध उन्हें यह आभास हुआ कि गाँव और शहर की परिस्थिति को और अच्छे से अपने साहित्य में ढालने के लिए कहानी द्वारा रचनात्मक ढंग में ढाला जा सकता है। ग्रामीण जीवन का यथार्थ चित्रण सहज भाव से पाठकों के मन पहुँचाया जा सकता है। उन्हें सदैव यही प्रतीत होता कि उनके भीतर एक गाँव जीता है और उस गाँव के सारे अभाव, विडम्बना, अवमानना, प्राकृतिक प्रकोप, संस्कृति और प्रेमभाव को एक अनुभव के तौर पर लेखनी से कागज पर उतार कर कथा साहित्य को मुख्य रूप से प्रदर्शित किया जा सकता है।

डॉ॰ रामदरश मिश्र जी का जीवन सादगी भरा है और उनका विनोदी स्वभाव दूसरों के साथ हार्दिकता से मिलना-झूलना उनके व्यक्तित्व को विभिन्न पहलुओं को स्पष्ट करता है। हिन्दी साहित्य में उनका स्थान प्रथम पंक्ति के साहित्यकारों में आता है।

डॉ॰ रामदरश मिश्र जी का पहला काव्य संग्रह 'पथ के गीत' सन १९५१ में प्रकाशित हुआ। इस संग्रह में ग्राम परिवेश का प्राकृतिक सौंदर्य अतिसरलतापूर्वक आत्मसात किया गया है। एक-एक रचना गाँव के जीवन का चित्र उकेर कर रख रही हैं और पाठन करते वक्त सामने चल रहे चल-चित्र की भांति प्रतीत होती हैं। इस कविता संग्रह के पश्चात उनके आठ काव्य संग्रह प्रकाशित हुए। कविताओं के लेखन के दौर में सन १९८६ में उनका 'बाजार से निकले लोग' गजल संग्रह भी प्रकाशित हुआ है। उन्होने सन १९४० से १९४६ तक जो भी कविताएँ लिखी उन्हें प्रारम्भिक गीत नाम देकर उसमें देहाती जीवन, गाँव के बाढ की परिस्थिति और उससे झूज रहे ग्रामीण लोगों की स्थिति, गाँव के प्राकृतिक सौंदर्य इत्यादि को बडी भावुकता के साथ रचा गया है। उनकी इस समय की सारी कविताओं पर छायावाद का प्रभाव पढ़ने मिलता है।

सन १९४७ में भारत की आजादी के पश्चात उनकी कलम स्वांत्रोत्तर गीत और वीर शहीदों के गुणगान करने में व्यस्त रही। सन १९४७ से १९६५ तक उन्होंने अनगिनत स्वांत्रोत्तर गीत और कविताएँ लिखी। यह कविताएँ भले ही आकर में छोटी होती थी पर उनका सारांश और भाव सीधे पाठक मन पर अपना ध्यान आकर्षित करने वाली होती हैं। उस समयकाल में 'बैरंग बेनाम चिठ्ठीयाँ' नामक एक गीत संग्रह अति प्रचलित हुआ जिसमें मिश्र जी के प्रगल्भ विचारों की अभिव्यक्ति अति सहजता से स्पष्ट होती हैं।

सन १९६५ से १९७० के बीच उनकी रचनाएँ नकारात्मक स्वर स्पष्ट करती है। इन समय की रचनाएँ दुख और बौधिकता का ज्ञान कराती हैं। 'पक गई धूप और कंधे पर सूरज' यह काव्य संग्रह इसके ज्वलंत उदाहरण रहे हैं। उसके पश्चात उनकी 'दिन एक नदी बन गया' और 'मेरे प्रिय गीत' तथा 'जुलूस कहाँ जा रहा हैं' इस काव्य संग्रह ने यह स्पष्ट कर दिया कि अगर दुख या आघात होता है तो कलम अपने आप उसे हृदय से निकल कर कागज पर उतार देती हैं जो समाज के सामने परिस्थिति से लड़ने का हौसला निर्माण करती हैं। इस तरह कविता लिखते-लिखते सन १९७० में उनके लेखन का झुकाव कहानियों की ओर बढ़ता गया और कविताएँ लिखने की गति धीमी होने लगी। उन्हें विश्वास था कि अपने विचारों को कहानियों का स्वरूप देकर अधिक सहजता और स्पष्टता से पाठकों के मन में अलग स्थान प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए डॉ॰ रामदरश मिश्र जी महान कवी के साथ-साथ एक सफल और श्रेष्ठ कहानीकार के रूप में भी प्रचलित हैं। उन्होंने अपने जीवन में भोगे हुए सामाजिक जीवन के दुख-दर्द और संघर्ष को कथा का स्वरुप देकर साहित्य लेखन की उन्मुखता और सामाजिक जिंदगी के प्रति लगाव को भलिभांति रचा है। मिश्र जी जब अपनी एम.ए. की पढाई कर रहे थे तब उन्होंने पहली कहानी 'संध्या आज' पत्रिका के लिए लिखी थी और जो पत्रिका में प्रकाशित भी हुई थी। कहानी लिखने का सिलसिला लगातार चलता रहा और उसके पश्चात 'प्रायश्चित' कहानी 'समाज' पत्रिका में प्रकाशित हुई जो बहुत प्रसिद्ध भी हुई थी। जिसको साहित्य प्रेमियों ने बहुत पसंद किया और एक श्रेष्ठ कहानीकार के रूप में उन्हें जाना जाने लगा। उनकी कहानी लिखने का सिलसिला अब तक बरकरार है और निरंतर गति से कहानिया लिखी जा रही हैं। सामाजिक विसंगति को अतिस्पष्ट रूप शब्दों से रचित करना उनकी कहानी लेखन की विशेषता रही हैं। अपनी जीविका के लिए वह बनारस, बडौदा, नवसारी जैसे महानगर में उन्होंने अपना वास्तव बनाया। गाँव देहात के बाद महानगरीय जीवन को नजदीक से देखने के पश्चात उसका सचित्र चित्रण उनकी कहानियों में पढ़ा जाने लगा। असल में सन १९५२ से डॉ॰ रामदरश मिश्र जी का कहानी लिखने का दौर शुरु हो गया था। सन १९६० तक उन्होने जो भी कहानियाँ रचित की उसमें शहर के अपेक्षा गाँव के जीवन का परिवेश का उल्लेख ज्यादा पाया जाता है। उनकी ज्यादातर कहानियों में जीवन के अभाव, अभिशाप गरीबी, गाँव की प्रकृति और उसके विविध रंग, त्यौहार, संस्कृति और मान्यताएँ ही चर्चित होती रही हैं जिसका यह भी कारण होता था कि 'धर्मयुग' और 'सारिका' जैसी नामवंत पत्रिकाओं में उसे बहुत प्रसिद्धि मिली थी। सन १९६८ में 'खाली घर' कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ जो बहुत ही चर्चित रहा। उसके बाद 'एक वह, दिनचर्या, सर्प दंश, वसंत का एक दिन, अपने लिए, मेरी प्रिय कहानियाँ इत्यादि कहानी संग्रह सन १९९० तक लगातार प्रकाशित होते रहें।

डॉ॰ मिश्र ने जो पहले पांच कहानी संग्रह प्रकाशित किए थे उनको मिलाकर सन १९८४ में एक मुख्य कहानी संग्रह प्रकाशित की जिसका शीर्षक 'इकसठ कहानियाँ' हैं। इन सभी कहानियों में कला के प्रति जागरुकता, सक्रियता तथा ग्रामीण जीवन के यथार्थ को उद्घाटित करने वाली गहरी संवेदनात्मक दृष्टि का पाठन होता है। उसे पढ़ते-पढ़ते इतना कौतूहल बढ़ जाता है कि उसे पूरा समाप्त किए बिना पाठक मन नहीं मानता और हर कहानी का अंत झकझोर करने वाला है जिसमें पाठक उस वस्तुस्थिति में अपने आप को उस पटल पर तथास्वरुप प्रकट होने का आभास करने लगता है। अनुभूत यथार्थ की भीतरी आवाज उनकी कहानियों की सबसे बडी शक्ति मानी जाती हैं। कहानियाँ पढते हुए अनुभूत अनुभव के अनूकूल सहज रचना-धर्मिता के दर्शन होते हैं। जिससे सारी संवेदनाएँ अपने आप मन को छूने लगती हैं तथा सहज सहभागी होकर अनुकरण करती, कचोटती रहती हैं। उनकी कहानियाँ हमेशा सामाजिक विषमता, ऊँचनीच, भेदभाव, सामान्य लोगों की व्यथा एवं संघर्ष पर विचार करने के लिए विवश करती हैं।

डॉ॰ रामदरश मिश्र की अधिकतर कहानियाँ समाज में व्याप्त सभी समस्याओं का विश्लेषण करती हैं। जैसे सरकार तथा खोखली नीति को बढ़ावा देते हुए 'नेता लोग और नारे बाजी, एक वह, मुर्दा मैदान, गपशप, सड़क कहाँ जाओगे आदि कहानियों में पढ़ने मिलता है। पारिवारिक सम्बंध के बीच ऊँच-नीच और रिश्तों को संभालते-संभालते टूटने का डर इसका वृतांत चित्रण' खाली घर, 'घर लौटने के बाद' आदि कहानियों से मिलता है। शिक्षा पर हो रहे भ्रष्टाचार और उसकी पद्धति का संक्षेप वर्णन 'मिसफिट, खंडहर की आवाज, सम्बंध, छुटता हुआ महानगर' इन कहानियों में अपनी जगह बना रहा है। संकीर्ण वृत्ति के कारण मानव में उत्पन्न होने वाली प्रांतीयता और कठोरता 'पराया शहर' इस कहानी से अधिक जाना जा सकता है। नारीवादी कहानियाँ और उनके जीवन के संघर्ष हमें 'एक औरत एक जिंदगी, अतीत का विष, आखरी चिठ्ठी, एक अधूरी कहानी, एक भटकी हुई मुलाकात' इत्यादि इन कथा संग्रह से वृस्तृत ज्ञान वृद्धि कराती है। दुर्बल, गरीब और अशिक्षित ग्रामीण लोगों का जीवन और उन पर होने वाले साहूकारों के अत्याचार 'कर्ज' नामक कथा संग्रह से पढ़ने मिलता है।

डॉ॰ रामदरश मिश्र प्रतिभाशील कथाकार के साथ अति सफल उपन्यासकार भी साबित हुए है। उनके द्वारा लिखे गए आंचलिक उपन्यास समाज में व्याप्त विषमता, रुढ़ी परमपरा, अव-मानवीय आर्थिक पूंजी-पतियो द्वारा शोषित गरीब वर्ग का शोषण आदि का चित्रण उनकी लेखनी से चित्रित होता है। उनके 'आकाश की छत' उपन्यास आंचलिकता में आधुनिकता का बोध करवाता हुआ एक बेहतरीन उपन्यास है। अंचल की परिस्थिति, खान-पान, रहन-सहन का विस्तृत लेखा-जोखा भली-भांति सत्य परिस्थिति से परिचित करवाता है। उनके उपन्यासों में दिखाई देने वाल गाँव सामान्य होकर भी अति विशिष्ट होते है। हिन्दी साहित्य में मिश्र जी द्वारा रचित उपन्यास शहरी जीवन का वर्णन भी अतुलनीय है।

डॉ॰ रामदरश मिश्र जी साहित्य की तरफ पूरी तरह से समर्पित होने के बाद भी वह एक कुशल अध्यापक भी साबित हुए है। अपने मृदु स्वभाव की वजह से वह बहुत सारे विद्ध्यार्थियों के प्रिय शिक्षक रहे हैं। सभी से मिलजुल भरा बर्ताव और अटूट सम्बंध उनके विद्धार्थियो के लिए गुरु शिष्य के रिश्ते में गहरा विश्वास पैदा करता था। हिन्दी साहित्य में अपना स्थान बनाने के पश्चात डॉ॰ रामदरश मिश्र जी ने विविध विधाओं में अपनी लेखनी को उजागर किया है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं के वह सम्पादक के रूप में भी कार्यान्वित भी हुए हैं।

डॉ॰ रामदरश मिश्र जी की 'हिंदी उपन्यास के सौ वर्ष' यह पुस्तक (उपन्यास) दो खंड में विभाजित होकर प्रकाशित हुई हैं। प्रथम खंड में प्रेमचंद के उपन्यास, प्रेमेचंद के युगीन साहित्य, आंचलिक उपन्यास, समकालीन उपन्यास, उपन्यास शिल्प इत्यादि पर अति गम्भीरता से विवेचन करते हुए उपन्यास के विकास पर समय-समय पर हुए परिवर्तनों के बारे में अति विस्तृत लेख सम्पादित किए गए हैं। दूसरे खंड में हिन्दी साहित्यकारों और साहित्य के लिए किए गए उनके योगदान और उनके श्रेष्ठ उपन्यासों के बारे में लेख सम्पादित किए गए है। उनके इस खंड में मुख्यत: प्रेमचंद, यशपाल, फणीश्वर रेणू, ज्ञानेद्र, अज्ञेय, रांगेय राघव, भगवती चरण वर्मा, भीष्म साहनी, राही मासूम रजा, विवेकी राय, इमांशू जोशी, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, आदी महान साहित्यकारों के लेख जोडे गए है जिसकी वजह से यह दोनों खंड हिन्दी साहित्य के इतिहास और अध्ययन में बहुत सार्थक और उपयोगी प्रसिद्ध हुई हैं।

डॉ॰ रामदरश मिश्र जी का हिन्दी का आंचलिक उपन्यास भी बहुत विख्यात रहा है। इस उपन्यास के भी दो भाग प्रकाशित हुए हैं। पहले भाग में समकालीन जीवन, आंचलिक उपन्यास की भाषा और चरित्र इत्यादि विषयों पर सम्बधित लेख प्रस्थापित हुए हैं। दूसरे भाग में हिन्दी के आंचलिक उपन्यास सम्बन्धी विज्ञानो द्वारा लिखे हुए लेख सम्पादित हैं। लेखों के साथ अन्य उपन्यासकारों के बारे में समीक्षात्मक लेख भी हैं।

सन १९८३ में डॉ॰ रामदरश मिश्र जी 'कथासप्तक' प्रकाशित पुस्तक कहानी साहित्य का स्वरुप एवं विकास तथा हिन्दी साहित्य के प्रमुख साहित्यकारों के व्यक्तित्व और उनकी कहानियों की समग्रता का उच्च उदाहरण समाविष्ट करती हैं। काव्य साहित्य का अध्ययन और मार्गदर्शन के लिए यह पुस्तक बहुत ही उपयुक्त साबित हुई है।

हिंदी साहित्य के महान रचनाकार और कवि कबीर, सुरदास, बिहारी भूषण इत्यादि प्राचीन कवियों के साथ मैथलीशरण गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, हरीवंश-राय बच्चन, मुक्तिबोध, नंदकिशोर आचार्य के व्यक्तित्व को स्पष्ट करती हुई उनकी 'काव्य गौरव' नाम पुस्तक भी बहुत प्रचलित रही है। यह पुस्तक सन १९८६ में प्रकाशित हुई है। यह पुस्तक हिन्दी काव्य साहित्य के लिए अमूल्य निधि के रूप में ज्ञानवर्धक अनुभूत है।

डॉ॰ रामदरश मिश्र जी प्रभावी कहानीकार के अलावा एक श्रेष्ठ समीक्षक भी रहे है। उनके द्वारा लिखे गए समीक्षात्मक ग्रंथ हिन्दी साहित्य में अतिमहत्वपूर्ण है। अपनी प्रतिभा और साहित्य के प्रति निष्ठा का परिचय देकर उन्होंने हिन्दी आलोचना का इतिहास, ऐतिहासिक उपन्यासकार, आज का हिन्दी साहित्य की संवेदना और दृष्टि, छायावाद का रचना लोक, इत्यादि समीक्षात्मक ग्रंथ का आविष्कार किया है। यह सारी पुस्तकें उच्च कोटी की हैं और हिन्दी साहित्य में अतिमहत्वपूर्ण योगदान के रूप में प्रतिपादित हुई है।

ललित निबंधकार के रूप में डॉ॰ रामदरश मिश्र जी ने सन १९८२ में 'कितने बजे है' नाम की पुस्तक प्रकाशित कर निबंध क्षेत्र में भी अपने हिन्दी साहित्य के प्रेम को जन-जन तक पहुँचाया हैं। उनकी 'जहाँ मैं खड़ा हूँ, रोशनी की पगडंडीयाँ,' टूटते बनते दिन, उत्तर पक्ष, सहचर समय है, इत्यादि आत्मकथात्मक वृत्त भी प्रकाशित है। 'तना हुआ इंद्रधनुष' यह यात्रा वृतांत का संग्रह उनकी हिन्दी साहित्य में सबसे बडी उपलब्धि साबित हुई हैं। जिसे पढते समय पाठक मन उस स्थिति में अपने आप को यात्रा के साथ जुड़ा पाता है। प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित होने की स्थिति में यात्रा वृतांत की यह पुस्तक सन १९९० में साहित्य सहकार दिल्ली से प्रकाशित हुई है।

बहुमुखी प्रतिभा के संपन्न कवि, कहानीकार, उपन्यासकार, संपादक, समीक्षक, निबंधकार डॉ॰ रामदरश मिश्र जी अध्ययन के कार्य के साथ अच्छे व्यक्तित्व व कृतित्व के धनी भी है। तनावग्रस्त देहात में पिछडे हुए मध्यमवर्ग में जन्म होने के बावजूद हिन्दी साहित्य में उन्होंने अग्रिम श्रेणी में स्थान प्राप्त किया है। जीविका के लिए नागरी जीवन और उसकी कठिनाइयों को झेलते हुए अपने संस्कार और ग्रामीण जीवन के प्रति कठिबद्धता रखते हुए जो उनकी गरिमा को उच्च स्तर पर ले जाती हैं। उन्होंने हिन्दी साहित्य में नाट्य विधा को छोड़कर लगभग सारी विधाओं में अपना लेखन किया है। भारतीय संस्कृति और साहित्य को निरंतर अपनी कलम से उजागर करने वाले डॉ॰ रामदरश मिश्र जी को अभिनंदन और असंख्य साधुवाद जिनकी वजह से हिन्दी साहित्य सुरक्षित और संवर्धित हैं।


 

डॉ. रामदरश मिश्र जीवन परिचय

जन्म

१५ अगस्त १९२४

जन्म स्थान

गांव डुमरी, जिला- कछार अंचल, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश

पिता का नाम

श्री रामचंद्र मिश्र

माता का नाम

श्रीमती कंबलपाति मिश्र

पत्नि का नाम

श्रीमती सरस्वती देवी मिश्र

सन्तान

श्री हेमंत मिश्र

श्रीमती अंजली तिवारी

श्री शशांक मिश्र

श्री विवेक मिश्र

सुश्री स्मिता मिश्र

भाई- बहन

स्व॰ रामअवध मिश्र

स्व॰रामनवल मिश्र

श्रीमती कमला देवी

साहित्यिक लेखन

काव्य एवं गजल

पथ के गीत, बैरंग-बेनाम चिट्ठियाँ, पक गई है धूप, कन्धे पर सूरज, दिन एक नदी बन गया, मेरे प्रिय गीत, बाजार को निकले हैं लोग, जुलूस कहाँ जा रहा है?, रामदरश मिश्र की प्रतिनिधि कविताएँ, आग कुछ नहीं बोलती, शब्द सेतु, बारिश में भीगते बच्चे, हँसी ओठ पर आँखें नम हैं (ग़ज़ल संग्रह), ऐसे में जब कभी, आम के पत्ते, तू ही बता ऐ जिंदगी (ग़ज़ल संग्रह),हवाएँ साथ हैं (ग़ज़ल संग्रह),कभी-कभी इन दिनों, धूप के टुकड़े, आग की हँसी, लमहे बोलते हैं, और एक दिन, मैं तो यहाँ हूँ, अपना रास्ता, रात सपने में, सपना सदा पलता रहा(ग़ज़ल संग्रह), पचास कविताएँ, रामदरश मिश्र की लंबी कविताएँ, दूर घर नहीं हुआ (ग़ज़ल संग्रह), बनाया है मैंने ये घर धीरे धीरे (ग़ज़ल संग्रह)।

उपन्यास

पानी के प्राचीर, जल टूटता हुआ, सूखता हुआ तालाब, अपने लोग, रात का सफर, आकाश की छत, आदिम राग,बिना दरवाजे का मकान, दूसरा घर, थकी हुई सुबह, बीस बरस, परिवार, बचपन भास्कर का, एक बचपन यह भी, एक था कलाकार

कहानी संग्रह

खाली घर, एक वह, दिनचर्या, सर्पदंश, बसन्त का एक दिन, इकसठ कहानियाँ, मेरी प्रिय कहानियाँ, अपने लिए, अतीत का विष, चर्चित कहानियाँ, श्रेष्ठ आंचलिक कहानियाँ, आज का दिन भी, एक कहानी लगातार, फिर कब आएँगे?, अकेला मकान, विदूषक, दिन के साथ, मेरी कथा यात्रा, विरासत, इस बार होली में, चुनी हुई कहानियाँ, संकलित कहानियाँ, लोकप्रिय कहानियाँ, 21 कहानियाँ, नेता की चादर, स्वप्नभंग, आखिरी चिट्ठी, कुछ यादें बचपन की (बाल साहित्य), इस बार होली में

ललित निबंध

कितने बजे हैं, बबूल और कैक्टस, घर-परिवेश, छोटे-छोटे सुख, नया चौराहा

आत्मकथा

सहचर है समय

यात्रा वृत्त

घर से घर तक, देश-यात्रा

डायरी

आते-जाते दिन, आस-पास, बाहर-भीतर, विश्वास ज़िन्दा है

आलोचना

हिंदी आलोचना का इतिहास (हिंदी समीक्षा: स्वरूप और संदर्भ, हिंदी आलोचना प्रवृत्तियां और आधार भूमि),  ऐतिहासिक उपन्यासकार वृन्दावन लाल वर्मा, साहित्य: संदर्भ और मूल्य, हिंदी उपन्यास एक अंतर्यात्रा, आज का हिंदी साहित्य संवेदना और दृष्टि, हिंदी कहानी: अंतरंग पहचान, हिंदी कविता आधुनिक आयाम (छायावादोत्तर हिंदी कविता), छायावाद का रचनालोक, आधुनिक कविता: सर्जनात्मक संदर्भ, हिंदी गद्यसाहित्य: उपलब्धि की दिशाएं, आलोचना का आधुनिक बोध

रचनावली

14 खण्डों में, कविता संग्रह, कहानी-समग्र|

संस्मरण

स्मृतियों के छन्द, अपने-अपने रास्ते, एक दुनिया अपनी, सहयात्राएँ, सर्जना ही बड़ा सत्य है,सुरभित स्मृतियाँ

साक्षात्कार

 

अंतरंग, मेरे साक्षात्कार, संवाद यात्रा

संचयन

बूँद बूँद नदी, नदी बहती है, दर्द की हँसी, सरकंडे की कलम

उनके साहित्य पर लिखी गई समीक्षात्मक पुस्तकें

उपन्यासकार रामदरश मिश्र सं॰ डॉ॰ वेद प्रकाश अमिताभ तथा डॉ॰ प्रेम कुमार, वाणी प्रकाशन, दिल्ली (१९८२)

कथाकार रामदरश मिश्र ले॰ डॉ॰ सूर्यदीन यादव, इंद्रप्रस्थ प्रकाशन, दिल्ली (१९८७)

रचनाकार रामदरश मिश्र सं॰ डॉ॰ नित्यानंद तिवारी तथा डॉ॰ ज्ञानचंद गुप्त, राधा पब्लिकेशन, दिल्ली (१९९०)

रामदरश मिश्र की सर्जन यात्रा ले॰ डॉ॰ महावीर सिंह चौहान, वाणी प्रकाशन, दिल्ली (१९९१)

कवि रामदरश मिश्र स॰ डॉ॰ महावीरसिंह चौहान तथा डॉ॰ नवनीत गोस्वामी, संस्कृति प्रकाशन अहमदाबाद (१९९१)

रामदरश मिश्र व्यक्तित्व एवं कृतित्व ले॰ डॉ फूलबदन यादव, राधा प्रकाशन, दिल्ली (१९९२)

मूल्य और मूल्य संक्रमण (रामदरश मिश्र के उपन्यासों के संदर्भ में ले॰ डॉ॰ विनीता राय, अनिल प्रकाशन इलाहाबाद (१९९९)

रामदरश मिश्र: व्यक्ति और अभिव्यक्ति स॰ डॉ॰ स्मिता मिश्र तथा डॉ जगन सिंह वाणी प्रकाशन, दिल्ली (१९९९)

रामदरश मिश्र: रचना समय ले॰ डॉ॰ वेद प्रकाश अमिताभ, भारत पुस्तक भंडार, दिल्ली (१९९९)

रामदरश मिश्र की उपन्यास यात्रा ले॰ डॉ॰ प्रभुलाल डी॰ वैश्य, डॉ॰ गुंजनशाह, शाह प्रकाशन अहमदाबाद (२००१)

रामदरश मिश्र के उपन्यास: चेतना के स्वर डॉ॰ गुंजन शाह, साहित्य भारती, दिल्ली (२००२)

रामदरश मिश्र के उपन्यासों में समाज-जीवन डॉ॰ प्रकाश चिर्कुडेकर, नमन प्रकाशन, दिल्ली (२००२)

रामदरश मिश्र की कहानियों में यथार्थ चेतना और मूल्य बोध डॉ॰ राधेश्याम सारस्वत अम्बा जी, गुजरात (२००२)

रामदरश मिश्र के उपन्यासों में ग्राम चेतना (जल टूटता हुआ' के संदर्भ में) डॉ॰ ममता शर्मा राष्ट्रीय ग्रंथ प्रकाशन गांधी नगर (२००२)

रामदरश मिश्र: एक अंतर्यात्रा डॉ॰ प्रकाश मनु, वाणी प्रकाशन दिल्ली (२००४)

रामदरश मिश्र के उपन्यासों की वैचारिक पृष्ठभूमि डॉ॰ सीमा वैश्य, सत्यम पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली (२००४)

रामदरश मिश्र की कविता: सर्जन के रंग डॉ॰ सूर्यदीन यादव, शांति पुस्तक भंडार, दिल्ली (२००५)

रामदरश मिश्र के उपन्यासों में गृह-परिवार डॉ॰ यशवंत गोस्वामी, नया साहित्य केंद्र, दिल्ली (२००५)

रामदरश मिश्र के उपन्यासों में नारी डॉ॰ मनहर गोस्वामी, नया साहित्य केंद्र, दिल्ली (२००५)

रामदरश मिश्र की कहानियों में पारिवारिक सम्बन्धों का स्वरूप डॉ॰ अमिता, स्वराज प्रकाशन दिल्ली (२००६)

रामदरश मिश्र के उपन्यासों में आंचलिकता डॉ॰ श्रीधर प्रदीप, अमर प्रकाशन मथुरा, (२००४)

रामदरश मिश्र के उपन्यासों में ग्रामीण परिवेश अनिल काले, चिंतन प्रकाशन कानपुर (२००७)

रामदरश मिश्र के साहित्य में ग्राम्य जीवन डॉ॰ वीरचन्द्र जी चौहान, चिंतन प्रकाशन कानपुर (२००६)

पुरस्कृत कृतियाँ

आग की हँसी (साहित्य अकादमी), रोशनी की पगडंडियां (हिंदी अकादमी दिल्ली), ‘हिंदी आलोचना का इतिहास‘, ‘जल टूटता हुआ‘, ‘हिंदी उपन्यास एक अन्तर्यात्रा‘, ‘अपने लोग‘, ‘एक वह‘, ‘कंधे पर सूरज‘, ‘कितने बजे हैं‘, ‘जहां मैं खड़ा हूँ‘, ‘आज का हिन्दी साहित्यः संवेदना और दृष्टि‘ (उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान) ‘अपने लोग‘ (आथर्स गिल्ड), ‘मैं तो यहाँ हूँ’,‘आम के पत्ते‘ (के.के. बिरला फाउंडेशन)

अनुवाद

अंग्रेजी

The Laughing Flames and other Poems (Poetry) साहित्य अकेडमी (२०२१)- (आग की हँसी) अनुवादक-उमेश कुमार 

Down of Red Flames, कृतिका बूक्स, दिल्ली (२०००)- (रात का सफर) अनु. - अनिल राजिम वाला

Modern Hindi Fiction (Criticism), बंसल अंड क., दिल्ली (१९८३) - (हिन्दी उपन्यास एक अंतर्यात्रा तथा हिन्दी कहानी अन्तरंग पहचान) अनुवादक- डॉ. ए.एन. जौहरी

The Sky Before Her and Other Short Stories, राधा पब्लिकेशन, दिल्ली, (१९९८) (चुनी हुई कहानियाँ) अनु. -वाई.एन. निगम

गुजराती

आगनी हँसी  (२०२१),साहित्य अकादमी, -(आग की हँसी)अनुवादक-आलोक गुप्ता

आदिम राग- दर्पण प्रकाशन, नडियाद (२००६)

(आदिम राग)अनु.- डॉ. यशवंत गोस्वामी

सगा बहालां – रंगद्वार प्रकाशन, अहमदाबाद (१९८९) - (अपने लोग) अनु.- मणिलाल पटेल

रात नी सफर - दर्पण प्रकाशन, नडियाद (२००६)- (रात का सफर) अनु.-डॉ. यशवंत गोस्वामी

दरवाजा बगरनु मकान - दर्पण प्रकाशन, नडियाद (२००६)- (बिना दरवाजे का मकान) अनु.-डॉ. यशवंत गोस्वामी

मराठी

आगीचं हास्य (आग की हँसी ) साहित्य अकादमी २०२२- अनुवाद दिलीप भाउ राव  पाटील

कन्नड़

रात्रिण पयाण (रात का सफर)  अनु.-जी. चन्द्रशेखर

मलयालम

रात्रिदूल ओस यात्रा (रात का सफर)  अनु.- डॉ. जयकृष्णन जे

पंजाबी

आग दी हसी(2021),साहित्य अकादमी, - (आग की हँसी)अनुवादक-अमरजीत कौर

चोनवींआं कहानी रामदरश मिसरीआं साहित्य अकादेमी पुरस्कृत (रामदरश मिश्र: संकलित कहानियाँ) अनु.- ज़िंदर

अकादमिक एवं साहित्यिक पद

अध्यक्ष, भारतीय लेखक संगठन १९८४-१९९०

प्रधान सचिव, साहित्यिक संघ, वाराणसी १९५२-५५

अध्यक्ष, गुजरात हिन्दी प्राध्यापक परिषद १९६०-६४

अध्यक्ष, मीमांसा, नई दिल्ली

अनेक मंत्रालयों में हिंदी सलाहकार समिति के सदस्य

गुजरात विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिंदी केन्द्र के प्रभारी प्रोफेसर १९५९-६४

अनेक विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम समिति के सदस्य

साहित्य अकादमी, हिन्दी अकादमी, दिल्ली तथा अनेक विश्वविद्यालयों तथा प्रतिष्ठित संस्थाओं की संगोष्ठियों की अध्यक्षता

कई पत्रिकाओं के सलाहकार संपादक

अध्यक्ष, प्रबंध समिति, राजधानी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय १९९९-२०००

साहित्यिक उपलब्धियाँ

रचनाओं का देश की प्रायः सभी भाषाओं में अनुवाद

अनेक विश्वविद्यालयों तथा विद्यालयों के पाठ्यक्रम में रचनाएँ

देश के अनेक विश्वविद्यालयों में २५० के लगभग पीएच.डी. एवं एम.फिल.  शोधकार्य

रचनाओं पर कई समीक्षात्मक ग्रंथ प्रकाशित, अनेक पत्रिकाओं के विशेषांक प्रकाशित

 

लेखक परिचय

सूर्यकांत सुतार सूर्या

हिंदी साहित्य के गुरुजनों से सीख जारी। आपकी कविता संग्रह और गीत-गजल की पुस्तकें प्रकाशित है। आपके भारत सरकार राज भाषा विभाग की पत्रिकाओं में आलेख प्रकाशित है। विभिन्न पत्रिकाएं एवं साझा काव्य संकलन में रचनाएँ प्रकाशित। मराठी भाषा में भी आपका काव्य संग्रह प्रकाशित। आप मराठी और हिंदी भाषा में लेखन करते है। विकिपीडिया हिंदी में साहित्यकारों की जीवनी पर आलेख संलग्न है। आद. रमेश पोखरियाल– मातृभूमि के लिए, बसंत चौधरी– वक़्त रुकता नहीं, डॉ०. मधु सन्धु– सतरंगो स्वप्नों के शिखर पुस्तक पर पुस्तक समीक्षा। आप ‘अनन्य तंज़ानिया’ हिंदी पत्रिका के संपादक है। ‘हिंदी है हम’ तंज़ानिया संस्था के सदस्य है। विभिन्न साहित्यिक संस्थानों और मंचों से सम्मानित एवं पुरस्कृत है।

चलभाष: +२५५ ७१२ ४९१ ७७७

ईमेल: surya.4675@gmail.com

पता: दार-ए-सलाम, तंज़ानिया, पूर्वी अफ्रीका

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