पुस्तक समीक्षा: मातृभूमि के लिए (काव्य संग्रह)- डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’

 

मातृभूमि के लिए (काव्य संग्रह)

 रचनाकार -  डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक

समीक्षक – सूर्यकांत सुतार सुर्या

पिनानी ग्राम पौडी गढवाल उत्तराखंड में जन्मे डॉ श्री रमेश पोख्ररियाल 'निशंक' भारतीय राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ अत्यंत प्रभावशाली साहित्यकार और लेखक भी हैं। जिन्हें बचपन से कविता, कहानियाँ, लेख लिखने का बहुत शौक हैं। भले ही आप मौलिक रूप से साहित्यिक विधा के व्यक्ति हैं और प्रथम कविता संग्रह वर्ष १९८३ में 'समर्पण' प्रकाशित हुआ हो परंतु उनकी कविताओ का चर्चा और प्रसिद्धि तो बहुत पहले से साहित्यकारों, रचनाकारों और श्रोताओं के दिल में घर कर चुकी थी। अब तक आप के १० कविता संग्रह, १२ कहानी संग्रह, १० उपन्यास, २ पर्यटन ग्रंथ, ६ बाल साहित्य, २ व्यक्ति विकास सहित कुल ४ दर्जन से अधिक पुस्तक प्रकाशित हो चुकी हैं। राष्ट्रवाद और देश सेवा की भावना उनमें कूट-कूट कर भरी हुई हैं यही कारण हैं कि उनका नाम राष्ट्र कवियों की श्रेणी में भी शामिल हैं। राष्ट्रप्रेम को देखते हुए उन्होंने 'मातृभूमि के लिए' काव्य संग्रह सन २००९ में प्रकाशित किया जिसमें राष्ट्रीय अस्मिता कि असंख्य कविताए पाठको को समर्पित की हैं। यह पुस्तक उनके उदात्त चिंतन और राष्ट्रीय सम्वेंदनाओ के प्रति पूर्णतः समर्पित हैं। यशस्वी शब्द साधक डॉ रमेश पोखरियाल 'निशंक' की 'मातृभूमि के लिए' कविता संग्रह की कविताए निश्चय ही देश में राष्ट्रप्रेम और मातृभूमि के प्रति भावना जागृत करेगी। मुझे तो यह संग्रह आपके जीवनानुभवो का सीने में धधकती आगवाला लगा जिसमें राष्ट्रप्रेम और सत्य–असत्य के कई रूप और सृजनात्मक झाकियाँ पढ़ने मिल रही हैं। इनके कविताओं का आधार देशप्रेम तथा मातृभूमि की तन-मन-धन से अंतिम सांस तक सेवा करते रहना ही हैं। अपने देश, राष्ट्र और साहित्यिक समाज को समर्पित यह पहला काव्य नहीं हैं ऐसे इनके अनगिनत साहित्य से भरे प्रकाशन हुए हैं जिसमें डॉ. निशंक की लेखनी कमाल कर रही हैं। उन्हें अपने स्वयं और मातृभूमि पर इतना विश्वास हैं कि वह कहते हैं

हम भारत कि फुलवारी में अनुपम वैभव विकसायेंगे

दम अपने खून पसीने से नव युग धरती कहलायेंगे

 

इस छोटी-सी कविता के माध्यम से निशंक जी ने देश के नौजवानों में आत्मविश्वास और एकता का बीज बोने की कोशिश की हैं।

वैसे तो काव्य पावन हृदय का एक एहसास हैं जो हृदय से होकर कलम के मार्ग से कागज पर उतरता हैं। जिसमें मानवीय चेतना काल्पनिक रूप धारण करके समाज को कुछ अच्छी संकल्पना की अनुभूति कराना चाहती हैं। कवि की संकल्पना भी कुछ इस तरह से अपनी छाप छोड़ रही हैं,

आज लानी हैं मुझे वह लालिमा जो खो रही हैं

और आदत वह मिटानी जो की जड़ता बो रही हैं

पूर्ण जड़त को मिटा मैं चेतना फिर से भरूंगा

आज मैं त्रिकाल बन, नव सृष्टि कि रचना करूंगा

'मातृभूमि के लिए' कविता संग्रह इस कसौटी पर पूर्णतः खरा उतरता हैं। कवी सदैव उदात्त चिंतन में रहते हुए समाज के लिए काम करते हुए देखे गये हैं। उनके जीवन मूल्य हमेशा उसूलों से कंधे से कंधा मिला कर चलते रहे हैं। इस कविता में भी उनका यही भाव प्रदर्शित होकर बिखर रहा हैं। अपने राष्ट्र हित में वह हमेशा जागरुक रहते हैं और कहते हैं

कुटिलता कि नीति तज-कर

राष्ट्र हित में जुझा करे

आज तन मन और धन से

राष्ट्र की पूजा करे

 

रोते नहीं हंसते हुए ही

पूर्ण यौवन दान दे

प्रौढ़ता परिपूर्ण जीवन

त्याग का परिधान ले

उनकी बहुविधा साहित्य सर्जन हमेशा गहराई कि सोच पर काम करती हैं। उनके कर्म इतने सदृध्ड और पारदर्शी होते हैं कि जीवन निर्मल दर्पण के समान प्रतीत होता हैं। उनकी कर्मशीलता और शक्ति का राज भी उनका देशप्रेम और राष्ट्रभक्ति हैं जो इस कविता संग्रह में हर कविता में पढ़ने और समझने मिलता हैं। उनकी निडरता भी इस कविता में बयान हो रही हैं। समय हमेशा बलवान होता हैं परंतु राजनीति की फिसलन भरी राहों पर भी वह हर चुनौती को स्वीकार करते हुए आगे बढना जानते हैं। जो उनकी अगली कविता में स्पष्ट रूप से छ्लकता हैं

स्वीकार कर ले यह चुनौती समय की

देखना मंजिल तुम्हारे पग में होगी

दूर हैं मंजिल बढते चलो

श्रम कर दिन रात तुम एक कर दो

तोड़ दो बाधक दीवारे राह की

राह को आज अटल शृंग कर दो

सूर्य जैसी अग्नि पीता हौसला

प्रखर होगी सफलता की शक्ति होगी

देखना मंजिल तुम्हारे पग में होगी

 

कवी की काव्य साधना के अनेक रंग असंख्य पाठको के हृदय को पुलकित करते हैं उनकी हर रचना में कही न कही प्रेरणा का श्रौत छुपा हुआ हैं। उन्हें हमेशा अपने राष्ट्र के गौरव पर बात करना बहुत अच्छा लगता हैं तथा मातृभूमि से बढ़कर उनके लिए कुछ नहीं बस यही अगली कविता की कुछ पंक्तियाँ दर्शाना चाहती हैं। जीवन के अनेक रंगों में से सिर्फ राष्ट्र प्रेम का रंग सबसे अधिक उन पर जचता हैं जिसके आगे वह धन दौलत को भी कोई महत्ता नहीं देते और वह कहते हैं

धन दौलत वैभव ना मिले माँ, भारतभूमि कि धूल मिले

धन से प्यार नहीं मिलता माँ, इन सब में हैं शूल मिले

मुझे स्वर्ग भी नहीं प्यारा

मुझे गोद माँ की प्यारी

जिस गोद में जन्म लिया

वही स्वर्ग सम हैं न्यारी

 

उत्तर भारत के राजनीतिक परिदृश्य में कवि 'निशंक' कि गणना उन राजनीतिज्ञों में होती हैं जिन्होंने अपनी संवेदनशीलता और सुचिंता के साथ-साथ जमीनी सतर पर कार्य करते हुए अपना विशेष स्थान बनाया हैं। राजनीति के साथ साहित्य में अपनी पहचान बनाने वाले वह सबके चहेता रचनाकार हैं। इनकी रचनाओं में विकासशील तथा सुसामजिक भारत की छवि दिखाई देती हैं। एक आदर्श भारत निर्माण करने की छटपटाहट हमेशा से उनकी रचनाओं में छ्लकती हैं। नयी सुबह की नयी किरण की चाह रखने वाले कवि अपनी कविता में कहते हैं

फैला हैं अँधियारा जग में, मिलकर दूर भगायेंगे

नयी किरण हैं हम आशा की, नूतन दीप जलायेंगे

घर-घर में अब दीपक होगा

जो जलना सिखलायेगा

पग-पग फैले स्वार्थ को

जो तन-मन से ठुकराएगा

स्वार्थ को ठुकरायेंगे हम, गीत विजय के गायेंगे

नयी किरण हैं हम आशा की, नूतन दीप जलायेंगे

 

युवा अवस्था में कवि के हृदय में एक अलग-सी बेचैनी दिखाई देती हैं। उनके शब्दों की स्मृतिया हैं जो युवा कवि में कही ना कही विचलित करती हुई कागज पर उतरती दिखाई देती हैं। जीवन की कठोर सच्चाइयों को बडी बारीकी से उन्होने अपने काव्य में रुपांतरित किया हैं। उन्हें कभी बड़े-बड़े महलो की चाह नहीं थी और यही चाह उन्होने मातृभूमि के सुपुत्रो को भी देने कि ख़्वाहिश रखी हैं। आज के समय में अपने बहुमूल्य समय को व्यर्थ ना गंवाने कि गुज़ारिश करते हैं। अपने पौरुष और हिम्मत का मातृभूमि के लिए इस्तेमाल करने की आशा रखते हैं और कहते हैं

रह-रह कर अब चलने का नहीं समय हैं, हे वीरों!

दिखला दो दुनिया को पौरुष, पीछे नहीं हटो धीरों

जवानो को चेतावनी देते हुए आगे कहते हैं

नही याद करता उसको जग, जो कुछ न करके दिखलाता

जीवन सारा व्यर्थ गुज़रता, कायर ही वह कहलाता

आज समय ऐसा हैं जग में, पाप-पूण्य से टकराया

सही दिशा में जाने वाला, मानव भी हैं घबराया

श्रेष्ठ मार्ग को अपना कर अब ही भाग त्यागो वीरों!

 

अपनी मातृभूमि के आजादी के पश्चात उन्होने अपनी रचनाओं में युवजन को देश सेवा में डटे रहने का संदेश दिया हैं। वे कहते हैं युवाओ का दायित्व अभी पूरा नहीं हुआ हैं। युवजन को अपनी मातृभूमि के प्रति बहुत काम करने बाकी हैं। इस विखंडित देश को जोड़कर रखना हैं तथा हर युवा को अपने पैरो पर खड़े रहकर पूरे भारत देश को मजबूत बनाना हैं। अपनी रचना से युवाओ को आवाहन करते हुए वे कहते हैं

आलस्य में क्यों पड़े हो नौजवान?

हे मातृ पुत्रो करो याद तुम

जो मिटा मातृभूमि पर रहा नाम गुम

उठो तुम धरा पर कमर कस के ठान

आलस्य में क्यों पड़े हो नौजवान?

 

निशंक जी की कविताओ में आरम्भ से ही राष्ट्रप्रेम की प्रखर भावना विस्तृत होती हैं। उनके लिए जनसेवा तथा राष्ट्रसेवा ही सर्वोपरि हैं। स्वामी विवेकानंद के नर सेवा नारायण सेवा का संदेश अपने जीवन में उतारने कि कोशिश करते रहते हैं। अपने देश के प्रति हमेशा कर्तव्य परायण रहते हैं। इस मातृभूमि के कण-कण को अपना ऋणी मानते हैं। जीवन अर्पण के बारे में उन्होनें यह बताने कि कोशिश कि हैं वह कहते हैं

यह जीवन ही तुझको अर्पण माँ, तू ने पाला बडा किया

उसे देव तुल्य शैशववस्था में, गोदी में तेरा दूध पिया

माँ! मैं सूर्य समर्पित होकर जीवन अर्पण करता हूँ

सब कुछ न्योछावर करने की, निज में प्रेरणा भरता हूँ

 

गहन अनुभूतियो को सहज अभिव्यक्त करना कवि के कविताओं की विशेषता रही हैं। कवि का जीवन हरे भरे जंगलों तथा पहाडियों पर बीता हैं। पहाडों की संकीर्ण पगडंडियाँ उन्हें अपनी मंजिल की ओर हमेशा लुभाती रही हैं। देव भूमि की पावन स्मृतियो को अपनी कविताओ में साकार करने वाले कवि की कविताओं और भावनाओं में पर्वतीय समाज और परिवेश दोनों का समावेश पढ़ने को मिलता हैं। पर्वतो की राहों से गुज़रते हुए वे कहना चाहते हैं

दुर्गम और भीषण

सारी चट्टाने पार कर

उसको भी तू साथ लिए जा

जो बैठा हैं हार कर

 

कवि ने धरातलीय स्तर पर घटित समसामयिक समस्याओं पर कलम चलाई हैं उनकी रचनाओं में पर्यावरण को लेकर प्रेम की भावना व्यक्ति कि गई हैं। आधुनिकता की होड में लगे पूंजीवादियो को भी वह पर्यावरण बचाव का पाठ पढ़ाना चाहते हैं। वर्तमान में पूरा विश्व कोरोना जैसे महामारी से जूझ रहा हैं ऐसे में पर्यावरण ही एक मार्ग साधन हैं जिनसे मानव विश्व में शांति निर्माण हो सकती हैं। इस महामारी से हारे मनुष्य जीवन को हौसला देने के लिए वह अगली कविता में कहते हैं

घर घर घूमे हरकारा

बदलो बदलो यह धारा

रुठा रुठा कैसा मौसम

रूखा रूखा सब जीवन

अब अंकुर 'ऋतूपर्ण' 'समर्पण'

हरियाली फैलाए गा

और विधाता घर-घर जाकर

गीत प्रगति के गाएगा

अब एक नया संसार दिखेगा

जो होगा प्यारा प्यारा

 

अपनी अस्मिता, सभ्यता और संस्कृति का हमेशा ध्यान रखने वाले कवि ने अपने आपसी रिश्तो और स्वार्थी पाखंडियो के बीच हमेशा दूरी बनाए रखी हैं। हमेशा अपने लक्ष्य के प्रति अटल रहने वाले कवि डॉ निशंक इंसान को जमीन, प्रकृति। आदर्श, संस्कृति, प्रेम, रिश्ते से दूर होते और मायावी दुनिया में भटकते रहने से बडी चिंता होती हैं। वह इंसानो में मनुष्यता खोजने कि कोशिश कर रहे हैं और अपने राष्ट्र के प्रति प्रेम लगाव तथा वफादार रहने की बार-बार हिदायत दे रहे हैं। इस समाज की आधुनिकता के आडम्बर में इनसानियत खोने की चिंता उन्हें खाये जा रही हैं। युवजन को बार-बार सम्भलने की समझ दे रहे हैं और कहते हैं

कौन हैं जिससे कहूँ मैं

व्यथा अपने इस हृदय की

बात बहु मन में उठी

अनुगूंज नीले इस निलय की

कौन निश्चल प्रीति देगा

कौन प्रेरित अब करेगा

अब तुझे खुद ही संभलकर

मार्ग में बढना पड़ेगा

 

कवि को देश की सुरक्षा से बढ़कर कोई धर्म नहीं लगता। बाजारीकरण की इस दुनिया में लालसा और स्वार्थता से परे जाकर उन्होने हमेशा यह संदेश पहुँचाने का कार्य किया हैं कि देश की सुरक्षितता और सम्मान का संघर्ष ही सबसे बडा तथा कीर्तिमान संघर्ष हैं। उनकी कविता ने हमेशा हिम्मत, आशाएँ तथा आकांशाएँ को झकझोरते हुए संदर्भ बाँधा हैं। हर सैनिक के मन में एक नयी उमंग और ऊर्जा बहाने की प्रेरणा दि हैं। 'तूफान आने पर भी बुझे ना, तुम्हें वह दीया आज ऐसा जलाना' ऐसा दृढ़ संकल्प लेकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हुई उनकी यह कविता हमेशा याद आती हैं इसके साथ ही वह आगे कहना चाहते हैं

जीवन मृत्यु के प्रश्न सामने

वह कैसा समय रहा होगा

होंठों पर मधु मुस्कान बसी

नयनों से अश्रु बहा होगा

विजय पताका हाथ लिए

किस क्षण तक मैने युद्ध किया

जब कि सोचा था जन-जन में

घन घोर मृत्यु का गरल किया

 

कवि एक सफल राजनेता होने के साथ-साथ प्रसिद्ध साहित्यकार भी हैं। जिनके मन में असंख्य सवाल उठते हैं। अपनी सकारात्मक सोच और शक्ति के सहारे उन्होने हर सवाल का जवाब ढुंढा फिर भी कभी-कभी कोई सवाल मन में रह ही जाते हैं। दुखो का जहर पीकर खुशियों की रिमझिम बारिश में झूमना उन्हें अच्छा लगता हैं। निराशा को मुँह तोड़ जवाब देकर संघर्षो से तूफान को पार कर क्षितिज को पाने की ख़्वाहिश रखते हैं। राष्ट्रवादी कवि डॉ निशंक की सोच किसी ना किसी रिति पर जाकर रुक जाती हैं जहाँ वह स्वयं से अनगिनत सवालों के घेरे में अपने आपको खड़े पाते हैं और पूछते हैं

मुझको तुम इतना बतला दो

सागर में इतना जल क्यों?

लहराती उफनाती रहती

नदियाँ करती कल-कल क्यों?

वृक्ष फूल और फल देते हैं

किंतु स्वयं क्या खाते हैं?

सदा दूसरों को फल देकर

वृक्ष स्वयं क्या पाते हैं?

साहित्य लेखन और कविता पाठन में दौरान उनके मित्र परिवार ने उन्हें 'निशंक' उपनाम से सम्मानित किया जिसका अर्थ होता हैं जिसके भीतर कोई शंका ना हो वह निशंक। उसके बाद हर साहित्य लेखन में उन्होने इसी उपनाम का उपयोग करना शुरू किया।

इस काव्य संग्रह 'मातृभूमि के लिए' में कवि ने भावी पीढ़ी को राष्ट्रीयता की भावना कूट-कूटकर तथा देश भक्ति का संदेश देने की असीम कृपा जागृत की हैं। इस संग्रह में कुछ खास कविताए 'भारत के रखवाले, दे भारत माता, त्रिपदी, ऐसा देश बनाए, समय की चुनौती, सुख की चाह नही, दीपक जलने दो, प्रिय गढवाल, आज निकट हैं लक्ष्य, इत्यादि भी शामिल हैं जो राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत भरी हुई हैं। डॉ निशंक की' मातृभूमि के लिए' काव्य संग्रह पढकर आनंद की अनुभूति होकर राष्ट्र के प्रति कुछ कर गुजरने की भावना जागृत हो रही हैं।

सूर्यकांत सुतार सूर्या

दार–ए-सलाम, तंजानिया, इस्ट अफ्रिका

फोन: +255 712 491 777

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