तीसरी लहर - कोरोना महामारी और बिखरता घर

तीसरी लहर - कोरोना महामारी और बिखरता घर


"उदय हो गयी सारी तैयारी? सब कुछ ठीक से रख लिया?" विजय ने निराश स्वर में कहा।

"हाँ भैया, हो गयी। सब कुछ ले लिया हैं।" उदय ने अपने बड़े भाई विजय से कहा

"भाई! यह आपकी जैकेट मेरे पास ही रह गयी थी। इसे तो आप बैग में रखना भूल ही गये।" उदय और विजय की बहन अरुंधती ने कहा

"नही छोटी, यह मैं भुला नहीं तेरे लिए ही रखी थी। तू ही रख ले इसे तुझे पसंद आ गयी हैं ना।"

"वैसे भी इतने सालो बाद तुझे मेरी कोई चीज पसंद आयी हैं।" बोलते-बोलते उदय का गला भर आया।

"तुझे याद हैं छोटी, पहले तू मेरी चीजों पर कितना जबरदस्ती करती थी, अपना हक़ जताया करती थी। मेरे ना देने पर रुठ कर बैठ जाती थी और मिल जाने पर प्यार से मुझे गले लगा लेती थी। आना... आज भी अपने भाई के गले लग कर खुश हो जा। आज बाबा जाने के बाद बहुत अकेला-अकेला लग रहा हैं।" कहते-कहते उदय की आंखों में आंसू आ गये।

दोनों को प्यार देख कर विजय की आंखें भी नम हो गयी और अपने आंसुओ को छिपाने खिड़की के बाहर देखता हुआ अपने विचारों में खो गया।

पिछले साल कोरोना के चलते पूरे देश, समाज के साथ-साथ हर घर की अर्थव्यवस्था हिल-सी गयी थी। ऐसा ही हाल कुछ विजय के घर का भी था। जिसमें उसके पत्नी के साथ माँ-बाप रहते थे। उदय अपने परिवार के साथ परदेश में रहता था और छोटी अरुंधती शादी करने के पश्चात दिल्ली अपने पति और बच्चों के साथ रहती थी। पिछले कुछ महीनों से पिताजी कि तबीयत खराब चल रही थी इसलिए उदय उन्हें मिलने तथा उनका इलाज़ करने अपने भैया के यहाँ आया हुआ था। परंतु उम्र और बिमारी की वज़ह से पिताजी के हालात में सुधार होने की बजाय और खराब होती गयी और अंत: मृत्यु को प्यारे हो गये। जिसका उन तीनों भाई-बहन को बहुत दुख था। उदय ने उनका अच्छे से अच्छे अस्पताल में इलाज़ कराने की कोशिश की पर क़िस्मत के लिखे के आगे किसकी चलती हैं। अंत्यविधि और बाक़ी की समस्त क्रिया समाप्त करते-करते उदय को वही रहना पड़ा और जब वापसी का समय आया तो कोरोना के कारण देश में और सारे शहर भर में संचार बंदी शुरू हो गयी थी। सारी अंतरराष्ट्रिय फ्लाइट बंद हो चुकी थी। एयरपोर्ट बंद हो चुके थे। उदय के पास वापस जाने का कोई साधन नहीं था। उसने उसके कम्पनी में इमेल के जरिये अपने अधिकारियों से घर से ही काम करने के अनुमति ले ली। अब वह घर पर रह कर ही काम करने लगा था।

परंतु ऐसे कितने दिल चलता वह अकेला यहाँ और पत्नी बच्चे सब वहाँ वह भी परदेश में अकेले। उदय भी परेशान हो गया था। एक तो महामारी का भय और वहाँ पत्नी बच्चों को अकेले रखने का डर। शुरु में एक–ढेड महीना तो भाई के साथ अच्छा बीता। परंतु उसके बाद थोड़ी-थोड़ी बहस होना शुरू हो गयी। एक दिन विजय ने उदय से कहा, उदय! तूम तो जनते हो, कोरोना के कारण घर की अर्थव्यवस्था कितनी खराब हो गयी हैं। काम भी अच्छा नहीं चल रहा हैं और ख़र्चा तो कम होने का नाम ही नहीं ले रहा हैं। "

"भैया, आप क्यों परेशान हो रहे हो। मैं हूँ ना घर के खर्चे की आप चिंता मत करो।"

"वह तो ठीक हैं पर तूम यहाँ कितने दिनों तक रहोगे। कभी ना कभी तो तुम्हें अपनी नौकरी पर वापस जाना पड़ेगा। तब घर के खर्चे कैसे चलाउंगा। इसलिए सोच रहा था कि बाबूजी की सारी जमा-पूँजी का बटवारा कर लेते हैं ताकि मैं बाज़ार से अपने नाम पर हुई सम्पति से कुछ लोन ले संकू। फिर जैसे ही सब ठीक होगा उसे छुड़ा लुंगा।" विजय ने झिझकते हुए कहा।

"भैया, आप ही कह रहे हो थोड़े दिन बाद सब ठीक हो जायेगा तो फिर थोड़ा सबर कर लेते हैं और वैसे भी यह बाबूजी ने सब अपने मेहनत से बनाया हैं अगर हम बेटे होकर भी उसमे जोड नहीं सकते तो उसे घटाने का अधिकार कैसे हो सकता हैं। मैं जनता हूँ अभी परिस्थिति ठीक नहीं हैं। मेरे भी काम की स्थिति अच्छी नहीं हैं यह महामारी सिर्फ़ हमारे भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में फैली हुई हैं। तो इसके चपेट में मेरी भी नौकरी आ सकती हैं। मुझे भी वह देश छोड़ कर आना पड़ सकता हैं। परंतु मैने बाबूजी की सम्पति को घटाने या उसे उधार रख कर पैसे बनाने के बारे में नहीं सोचा।"

उदय अपने बड़े भाई को समझाने की कोशिश कर रहा था।

"उदय! तुम्हारे लिये यह सब बहुत छोटी बात होगी पर हम यहाँ रहते हैं और मैं माँ-बाप का सारा ख़र्च उठाता हूँ तो मुझे पता हैं कितनी परेशानी होती हैं एक परिवार चलाने में। भगवान की दया से तुम्हारी नौकरी अच्छी हैं जिससे तुम्हें किसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता। एक बार बड़े परिवार को सम्भाल कर देखो।" कहते-कहते विजय चुप हो गया।

" भैया, मैं आपकी सारी बातों को समझता हूँ पर फिर भी मैं यही कहना चाहूँगा बाबूजी की सम्पति पर इस तरह से कर्जा लेना अच्छी बात नहीं है वह भी इतने जल्दी। अभी उन्हें चल बसे दिन ही कितने हुए हैं। बाबूजी ने हमेशा मेहनत की हैं और सर उठा कर रहे हैं हमें इतना पढाया लिखाया पर कभी किसी के आगे एक पैसे की मदद नहीं ली और ना ही उधार लेकर हमारी परवरिश की। फिर हम उनके बेटे होकर ऐसे कैसे कर सकते हैं। प्लीज... आप ज़रा इत्मीनान रखिए सब ठीक हो जायेगा। "

"उदय! मेरे सब्र का बाँध टूटता जा रहा हैं। मैं चाहता हूँ कि अब समय रहते हम तीनों भाई बहन मिलकर सब कुछ बाँट लेते हैं। तुम ज़रा इस बात पर गहराई से सोचना और कल तक मुझे बता देना।" विजय ने अपनी बात पर ज़ोर देते हुए कहा।

"भैया! मैं बटवारे के लिए थोड़ी ना मना कर रहा हूँ। वह आज नहीं तो कल कानूनन हमें करना ही होगा॥" उदय ने बडी दीनता भरे स्वर में कहा।

उसी समय उदय के मोबाइल की घंटी बजी जिससे विजय का ध्यान टूटा।

आखिर चार महीने बाद उदय की कम्पनी ने भारत की वंदे मातरम की योजना वाली महामारी कि वज़ह से यहाँ वहाँ फंसे हुए भारतीय को लाने और ले जाने के लिए फ्लाइट शुरु कि थी जिसमें उदय का टिकट बुक करा कर उसे वापस आने को कहा गया। तो वह आज का दिन था जो उदय अपने जाने कि तैयारी कर रहा था। उदय तो बहुत खुश था साढे पांच महीने बाद वह अपने पत्नी और बच्चे के पास जा रहा था।

"उदय! चलो मैं तुम्हें एयरपोर्ट छोडने आता हूँ।" विजय ने अपनी सोचस्तिथि से बाहर आकर कहा।

" नहीं भैया, कोई बात नहीं मैं चला जाउंगा। आप क्यों तकलीफ ले रहे हैं। वैसे भी बाहर की हवा कुछ ठीक नहीं चल रही हैं। आप घर पर ही आराम कीजिए। आज कल एयरपोर्ट पर भीड़ करना भी अलाउड नहीं हैं।

कुछ देर बाद टैक्सी वाले का फ़ोन आया कि वह बाहर इंतज़ार कर रहा हैं। फिर से छोटी और भैया को गले लगा कर अपनी भाभी कि तरफ़ आशीर्वाद लेने बढ़ा पर भाभी ने रोककर उसे गले लगाया और कहा अगली बार बच्चों को और इंदु (उदय की पत्नी) को लेकर आना वैसे मत आना।

"जी भाभी! ज़रूर।" कहकर उदय ने विदा ली।

बड़े भैया के दोनों बच्चों को प्यार से आशीर्वाद देकर अपने दोनों हाथों में बैग उठा कर उदय निकल गया। आधे रास्ते में पहुँचा तो जाम लगा था। ड्राइवर से पूछा तो पता चला आज किसान आंदोलन चल रहा हैं और आंदोलनकारी सडको पर उतर आये हैं कुछ तो सडक के बीच पलथी मारकर बैठ गये हैं किसी गाडी को आने जाने नहीं दे रहें हैं। उदय ने गाडी से उतरकर देखा तो दूर तक गाडियों की लम्बी कतार लगी हुई थी। उसे तो कुछ समझ नहीं आ रहा था। अभी तो चार घंटे थे उसके पास। उसने ड्राइवर से कहा कोई और रास्ते से लेकर चलो। पर गाडी हिल ही नहीं सकती थी क्योंकि उनकी गाडी के आगे-पीछे दाएँ-बाएँ गाडीयाँ लग गयी थी। पूछताछ करने पर पता चला की यही एक रास्ता हैं जो शहर के मुख्य रास्ते से जाकर मिलता हैं और फिर मुख्य रास्ते से दो तीन रास्ते हैं जो एयरपोर्ट जाता हैं। उदय की हृदय गति तीव्र होती चली थी।

उसने सोचा था घर से एक घंटे में एयरपोर्ट पहुँच जायेगा और फिर बाक़ी का समय महामारी के चलते जो चेक इन में देरी होती हैं वहाँ लग जायेंगे पर अब तो सारा गणित विपरीत हो रहा था। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। उसने लगा कि भैया को फ़ोन करके सब कुछ बता दे पर फिर कुछ सोचकर चुप रह गया। उसने उतरकर अपना सामन लेकर दूसरी और जाने की कोशिश की पर कही कुछ सफलता नहीं मिली। आखिरकार फिर से वह अपनी टैक्सी में आकर बैठ गया और रास्ता खुलने का इंतज़ार करते-करते इस देश की बिगड़ी हुई हालात के बारे में सोचने लगा। कोरोना कि लहर से पूरे देश पर कैसा प्रभाव पड़ा हैं। गरीब मजदूरों को खाने के लाले पड़े हुए हैं और यहाँ कुछ लोगों को आंदोलन करना हैं भीड़ इकट्ठा करनी हैं। महामारी के नियमों का पालन नहीं करना हैं। अन्य देशों के मुकाबले सिर्फ़ भारत में ही कोरोना कि परिस्थिति भयावह और अनियंत्रित बनी हुई हैं क्योंकि लोग पढ़े लिखे होने के बावजूद अनपढ़ जैसे व्यवहार करने लगते हैं। अब यही देख लो इतने बड़े पैमाने पर भीड़ या आंदोलन होगा तो फिर से महामारी बढेगी फिर से मृत्यु का तांडव शुरू होगा। किसी को अस्पताल में बेड नहीं मिलेंगे तो किसी को आक्सीजन के सिलेंडर की कमतरता होगी। फिर सरकार को ही दोष दिया जायेगा पूरी व्यवस्था को गाली दी जायेगी। इतने पर नहीं रुकेंगे यही पढ़े लिखे लोग एक दूसरे के जान के दुश्मन बनकर कभी अस्पताल में बेड दिलाने के लिए पैसो की मांग की जायेगी तो कभी आक्सीजन के सिलेंडरों की अफरा तफ़रीह की जायेगी। क्या आपने इस महामारी में एक भी देश में आक्सीजन के सिलेंडरों कि तस्करी के बारे में सुना या पढ़ा पर हमारे यहाँ यह आम बात हैं। जिसे ज़रूरत नहीं वह भी अपने घर में सिलेंडरों को छुपा कर रख रहा हैं। यह सोच कर पता नहीं कब ज़रूरत पड़ जाए। दूसरों को मिले या ना मिले पर अपने घर में सारी सुख सुविधायें होनी चाहिए फिर बाक़ी दुनिया के लोग जाए भाड़ में। ऐसा नहीं हैं कि विदेशों में इस महामारी का प्रभाव नहीं पड़ा। वहाँ भी मृत्यु ने अपना खेल दिखाया। वहाँ भी हालत गम्भीर थी। परंतु वहाँ के लोगों ने तुरंत सतर्क हो कर सभी नियमों का दृढ़ता से कठोरता से पालन किया। स्वयं ही लोगों ने एक दूसरों से दूरी बना ली। बिना काम के निकलना बंद कर दिया। एक दूसरों की मदद करना शुरू कर दिया। जितना उन्हें चाहिए बस उतना ही रख कर बाक़ी दूसरों के लिए रखना शुरू कर दिया। परन्तु इसके विपरीत हमारे यहाँ हो रहा था। ख़ुद का तो घर भरेंगे ही पर और ज़रूरत नहीं होते हुए भी दूसरों के घरों में भी छापे मारकर ले आयेंगे। मुझे बहुत ही तिस्कृत होता हैं ऐसी समाज व्यवस्था से।

उदय की सोच जारी रही, आज अगर एयरपोर्ट समय पर नहीं पहुँचा तो कम्पनी के साथ-साथ मेरा भी नुक़सान होगा यही सोच कर उदय के हाथ पैरो में पसीना छूट रहा था। वह अंदर ही अंदर बेचैन हो रहा था। उसकी मन स्थिति बहुत विचलित हो रही थी। हृदय तेज गति से दौड रहा था। उसने विजय को फ़ोन करने अपनी जेब से फ़ोन निकाला तो उसकी उँगलियाँ काँप रही थी। उसी समय विजय का फ़ोन आ गया। अपने काँपते हाथों से उसने फ़ोन उठाया। विजय के हेलो कहने के तुरंत बाद उदय ज़ोर जोर से रोने लगा। विजय को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या हुवा हैं। उसने पहले उदय को शांत किया और पूरी बात समझने की कोशिश की। उसने उदय से घर वापस आने की सलाह दी। पर उदय ने किसी तरह अपने आप को शांत किया और कहा कि वह पहले एयरपोर्ट जाकर देखेगा फिर निर्णय करेगा हो सकता हैं कोरोना महामारी और इस आंदोलन की वज़ह से फ्लाइट देरी से चल रही हो। इसी आशा से वह धीरे-धीरे चलती गाडी से बाहर देखने लगा। वह बार-बार भगवान से प्रार्थना कर रहा था कि किसी तरह वह एयर पोर्ट पहुँच जाए। गाडी कुछ देर चलती फिर रुक जाती। यही सिल सिला चल रहा था। राह चलते किसी ने बताया कि रास्ता खुल रहा हैं। पुलिस ने आंसू गैस छोड़ा तब कही आंदोलनकारी वहाँ से हटे। पुलिस की कार्यवाही से अब रास्ता थोड़ा-थोड़ा खुल रहा था और उसी के साथ उदय भी अपने विचारों में खो रहा था कि आजादी के इतने वर्षो बाद भी हम आरक्षण, आंदोलन करना, सडको पर उतर आना, सरकारी सम्पति को नुक़सान पहुँचा ने से बाज नहीं आते। आजादी के पहले यह सारा नुक़सान करने का ध्येय कुछ और था पर क्यों आज भी हम आजाद होने के पश्चात गुलामों कि तरह जीवन व्यतीत कर रहे हैं। आख़िर समाज में रहने वाले क्यों एक दूसरों को स्वतंत्र जीने की स्वाधीनता नहीं देते, क्यों उन्हें अपना गुलाम बनाकर रखना चाहते हैं। परंतु इसका मुख्य कारण भी हम ही हैं। चुनावों के वक़्त हम सिर्फ़ हमारे क़रीबी या जो हमें थोड़ी लालच देते हैं उन्हें ही विजयी बनाते हैं और फिर जब वह पलट कर हमारी परेशानियाँ दूर करने नहीं आते तब हम सडकों पर आकर उनके नाम की धज्जियाँ उडाकर हमारे ही कर भुगतान किए गये आधारभूत संरचनाओं को नुक़सान पहुँचाते हैं फिर उन्हें बनाने के लिए सरकार हमसे ज़्यादा मात्रा में पुनः: कर वसूल करती हैं। यह एक जीवन चक्र बन गया हैं जिसकी गति हमारे व्यक्तिगत जीवन और समझदारी के पहियों पर चल रही हैं।

 

अचानक ज़ोर के ब्रेक से उदय का ध्यान हटा। उसने बाहर देखा तो वह एयरपोर्ट पहुँच चुका था। उसके चेहरे पर ख़ुशी छलक आयी। तुरंत उसने टैक्सी वाले को बख्शीश के साथ पैसे अदा किए और दोनों हाथों में अपना सामान लेकर दौड़ता हुआ चेक इन की खिड़की कि तरफ़ लपका। ख़ुशी-ख़ुशी हांफते हुए उसने अपना पासपोर्ट और टिकट उस खिड़की पर दिया। पर परिचारिका का जवाब सुनकर उसका खिलखिलाता हुआ चेहरा उदासी में बदल गया। फ्लाइट तो आधे घंटे पहले ही उड़ चुकी थी। उदय आधे घंटे देरी से था। परिचारिका ने बताया उसका नाम तीन बार पुकारा गया पर कोई जवाब नहीं आने की वज़ह से उन्हें विमान को उडाना पड़ा। वह स्तब्ध होकर वही बैठ गया और उसके आंखों के सामने उसकी पत्नी और बच्चे की सुरत आ रही थी। उसका मन ज़ोर-ज़ोर रोने को कर रहा था। उन सारे आंदोलनकारियो को मन ही मन कोस रहा था। उसे बहुत गुस्सा आ रहा था पर वह शांत होने के सिवाय कर भी क्या सकता था। उसने दूसरी फ्लाइट के बारे में पूछताछ की पर कोई लाभान्वित जानकारी हासिल नहीं हुई। कोरोना के चलते वैसे ही कुछ एक आध कम्पनी की विमान सेवा चल रही थी वह भी हर देश में नही। आखिरकार उदय निराश होकर वही एक बेंच पर काफ़ी देर तक रोता रहा।

आज उसे दूसरों के गैर जिम्मेदारी की वज़ह से हो रहे नुक़सान के बारे में सोच के बहुत दुख हो रहा था। कुछ देर बाद उसने विजय को फ़ोन करके सारी हक़ीक़त बता दी। विजय भी बहुत दुखी हुआ परंतु दूसरी तरफ़ थोड़ा खुश भी था कि उदय अब कुछ और दिन उनके साथ रहेगा और बँटवारे का काम जो अधूरा था अब वह पूरा हो जायेगा।

 

n सूर्यकांत सुतार सूर्या

दार--सलाम, तंज़ानिया

Comments

Popular posts from this blog

डॉ. रामदरश मिश्र की साहित्यिक जीवन यात्रा

पुस्तक समीक्षा: मातृभूमि के लिए (काव्य संग्रह)- डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’

तंझानिया मध्ये गुडीपाड्व्या निमित्त नवीन वर्षाचे स्वागत दण्क्यात साजरा