जयशंकर प्रसाद -
साहित्य में अभिव्यक्त युगबोध
महाकवि जयशंकर प्रसाद छायावादी कविता के आधार स्तम्भ है।
उन्हीं की 'झरना'
प्रकाशित कृति से छायावाद कवि का जन्म हुआ था। जयशंकर प्रसाद
को कवि युग कि चेतना स्वतंत्र रूप से प्राप्त थी। उनके ४८ वर्षो का जीवन काल बहुत
ही संघर्षपूर्ण व चुनौतियों से भरा था। उनकी कविताओं में सौंदर्य दर्शन की
चित्रात्मक विशेषता होती है। प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात राजनीतिक व्यवस्था बिखरी
पड़ी थी। भारत गुलामी की जंजीर में जकड़ा हुआ था और उसी वक़्त हिन्दी के व्याकरण
को सुव्यवस्थित करने के लिए खड़ी बोली को हिन्दी भाषा का मानक रूप देने का निर्णय
लिया गया था। ऐसे में आदर्शवादिता मर्यादिवादिता और अतिरंजित नैतिकता का साहित्य
मुक्त होने की कोशिश में था। उन साहित्यकार में सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
जी के साथ जयशंकर प्रसाद भी इस अभियान में शामिल होने निकल
पड़े थे। व्यापार की असफलता के बाद जयशंकर प्रसाद के परिवार को उज्जैन छोड़ काशी में
स्थापित होना पड़ा और पिता के देहांत पश्चात उन्हें ही अपना खानदानी व्यापार
सम्भालना पड़ा था। घर के वातावरण के कारण साहित्य और कला के प्रति उसमें प्रारंभ
से ही रुचि थी। उन्होंने वेद,
इतिहास,
पुराण तथा साहित्य शास्त्र का अत्यंत गंभीर अध्ययन किया था।
व्यापर के साथ-साथ साहित्य
के प्रति भी उन्हें बहुत लगाव था। नौ वर्ष की उम्र में ही उन्होने अमरकोश और लघु
कौमुदी कंठस्थ हो गयी थी। वह अपने गुरु मोहनलाल गुप्त 'रससि' को वह बहुत मानते थे। उनके साहित्य की शुरुवात भी उन्हीं के मार्गदर्शन के
दौरान एक सवैया लिखकर शुरू हुई थी। अपनी सक्षम भाषा शैली की विशेषता और शब्द विकास
के कारण उन्होने कविता नाटक,
कहानी,
उपन्यास आदि सभी साहित्य में अपनी छाप छोडना शुरू कर दिया
था। वह एक अत्यंत बहुमुखी प्रतिभाशील साहित्यकार थे। ब्रज भाषा में भी उनकी अच्छी
पकड थी इसलिए १९०९–१९१० में लगभग सारी प्रकाशित काव्य ब्रज भाषा में ही थी। इनकी
प्रारम्भिक रचनाएँ ब्रज भाषा में ही थी जो आगे चलकर प्राचीन परम्परा का पालन करती 'कामयानी’ जैसे गौरवशाली महाकाव्य के रूप में प्रकाशित हुई।
जयशंकर प्रसाद जी के नाटक, कहानी, उपन्यास एक अलग ही कल्पना शक्ति को प्रदर्शित करते है उनके
सभी साहित्य में प्रकृति के वर्णन की अद्यतनीय क्षमता होती थी। प्रसाद जी सहित में
ऐसे अभिव्यक्त के रूप में गिने जाते थे। जिससे उनकी रचना में अतीत के प्रति एक
प्रकार की मोहकता और मादकता भरी आसक्ति मिलती हैं। वह एक सौंदर्यव्यक्त लावण्य कवि
थे। उनकी लगभग सारी रचनाओं में स्मृतियों तथा शृंगार के अतृप्त भावनाओं का आभास मिलता
हैं। कानन-कुसुम, चित्राधार आदि रचनाओं में इन्हीं भावनाओं का प्रगाड अभ्यास
पढ़ने को मिलता है। उनकी सौंदर्य दर्शन और क्ष्रंगारिकता की रचनाओं में प्रकृति के
कण-कण में सौंदर्य का दर्शन करने वाली शब्द शैली का वर्णन किया गया है। कई बार तो
उनकी रचनाओं में अंतर सौंदर्य का भी सूक्ष्म अंक पढ़ने और महसूस करने मिलता है।
प्रेम में भावविभोर होकर प्रेम लहरों के भांति उतार चढ़ाव को भलिभंति प्रदर्शित
करना उन्हें आता था।
आह रे! वह अधीत यौवन
अधर में वह अधरों की प्यास
नमन में दर्शन का विश्वास
धमनियों में अलिंगनमयी
वेदना लिए व्यथायें नई
छूटते जिससे सब बंधन
सरस सौकर से जीवन कन
जयशंकर प्रसाद जी आध्यात्मिक सौंदर्य के उपासक थे। वह सौंदर्य चित्रण में रितिकालीन सूक्ष्म और कोमल अभिव्यक्त थे। उनके शब्दों में अनुभूति के साथ-साथ चिंतन की प्रधानता होती थी। एक अतृप्त प्रेम की अनुभूति को उन्होने बहुत ख़ूब अपने शब्दों में पिरोया है। यौवन का आवेग, झंझावात तथा हलचल नहीं, बल्कि एक शांति गहराई तथा उज्वल्लता है और यही मुख्यत: उनकी शैली तथा कार्यकुशलता थी जो पीडा से घनीभूत होकर छायी हुई धारा को आँख बनाकर बरस जाने के लिए बाध्य करती थी। जिसमें कवि वैयक्तिक धरातल से ऊपर उठ कर जीवन के सम्बंध को अधिक गम्भीरता से विचार करने में बाध्य हो जाता है। यह उनके क़लम की ताकत थी जो हर पाठक वर्ग उनके शब्दों को अपने अंतरमन से जोड़ने की कोशिश करता है
धीरे से वह उठता पुकार
मुझको न मिला रे कभी प्यार
उनकी रचनाओं में मुख्यत: बाह्य विषयों के अपेक्षा वैयक्तिक अनुभूतियों की अभिव्यक्त अधिक पढ़ने को मिलती है। वह हमेशा प्रेम का चित्रण नारी के माध्यम से अधिक करते थे किंतु वही आगे चल कर अलौकिकता की ओर तत्पर होते गए। जयशंकर प्रसाद जी के जीवन के संघर्ष ही उन्हें आशावादी साहित्यकार के रूप में सभी के समक्ष रहने में सक्षम हुए है। उन्होने अपने सुख दुख मयी अनुभूति की विवृत्ति ही अपने काव्य में की है। वे दुख और निराशाओं का निराकरण ही अपने जीवन का लक्ष्य मानते थे और यही लक्ष्य उन्हें ‘कामयानी’ प्रस्तुतिकरण में लाभदायक सिद्ध हुआ। उनके प्राकृतिक काव्य में जड़ चेतना सम्बंध और आध्यात्मिक दर्शन भी होते है। प्रकृति के सचेतन अनुभूति के पीछे एक प्रेम सत्ता का आभास उनके काव्य में स्वतंत्र हुआ है। यही उनका रहस्यवाद है। उनकी एक ही रचना में विभिन्न प्रकार एक अद्वैत या सर्वात्मवाद दिखाई पड़ता है। कभी कवि निर्गुण सत्ता से रागात्मक सम्बन्ध स्थापित करता है तो कभी कुछ पूछता है कभी मिलन के लिए उत्सुक हो उठता है कभी वियोग में आंसू रोता है तो कभी उसे पुकार उठता है।
अरे! बता दो मुझे दया कर
कहाँ प्रवासी हैं मेरा
उसी बावले से मिलने को
डाल रही हूँ मैं फेरा
जयशंकर प्रसाद जी
का मानवीय पक्ष भी मानवता से ओत प्रोत भरा हुआ था। विश्व बंधुत्व की भावना उनकी
कविताओं में क़दम कदम परिलक्षित के आक्रोश और जाति एवं वर्ग गत संकीर्णता से ऊपर
उठ कर विश्व मानवता का जय घोष करता जयशंकर प्रसाद जी के लेखन में पढ़ने को मिलता
है। वह मानवतावादी विचार के साहित्यकार थे।
क्यों इतना आतंक ठहर जा ओ गर्वीलेपन
जीने दे सबको फिर तू भी सुख से जी ले
जयशंकर प्रसाद जी पहले ऐसे साहित्यकार थे जो प्रकृति को
सजीव रूप से स्वीकार कर अपनी कल्पनाओं के द्वारा चित्रीकरण प्रस्तुत करते थे।
उन्होने विभिन्न प्राकृतिक तथा संस्कृतिक भाषा में विशेष रूप से पाया जाता हैं गति
शैली की प्रमुख तत्व वैयक्तिकता, भावात्मकता,
संगीतात्मकता, संक्षिप्तकता, कोमलता, ध्वन्यात्मकता, नाद, सौंदर्य आदि इनके साहित्य में हमेशा पढ़ने और समझने मिलता
है।
जयशंकर प्रसाद जी
एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उनकी रचना प्रक्रिया विभिन्न साहित्यिक विधाओं में
प्रतिफलित हुई है। कविता,
उपन्यास,
नाटक और निबन्ध सभी में उनकी गति समान है। किन्तु अपनी हर
विधा में उनका कवि सर्वत्र मुखरित होता है। वह एक कवि की गहरी कल्पनाशीलता को
विशिष्ट और व्यक्तिगत प्रयोग करने के लिये अनुप्रेरित करते है। उनकी कहानियों का
अपना पृथक और सर्वथा मौलिक शिल्प है, उनके चरित्र-चित्रण का, भाषा-सौष्ठव
का, वाक्यगठन का एक सर्वथा निजी प्रतिष्ठान है। उनके नाटकों में भी इसी प्रकार के
अभिनव और श्लाघ्य प्रयोग मिलते है। अभिनेयता को दृष्टि में रखकर उनकी बहुत आलोचना
की गई तो उन्होंने एक बार कहा भी था कि रंगमंच नाटक के अनुकूल होना चाहिए न की
नाटक रंगमंच के अनुकूल। उनका यह कथन ही नाटक रचना के आन्तरिक विधान को अधिक
महत्त्वपूर्ण सिद्ध कर दे। कविता के क्षेत्र में इस नव-अनुभूति के वाहक वही रहे है
और प्रथम विरोध भी उन्हीं को सहना पड़ा है। भाषा शैली और शब्द-विन्यास के निर्माण
के लिये जितना संघर्ष प्रसाद जी को करना पड़ा है, उतना
किसी दूसरे साहित्यकार को नही।
प्रसाद जी की रचनाओं में
जीवन के विशाल क्षेत्र के साथ-साथ प्रेम, सौन्दर्य,
देश-प्रेम,
रहस्यानुभूति, दर्शन,
प्रकृति चित्रण और धर्म आदि विविध विषयों को साहित्यकारों
के सम्मुख प्रस्तुत किया गया है। प्रसाद जी ने राष्ट्रीय गौरव और स्वाभिमान को
अपने साहित्य में सर्वत्र स्थान दिया है। उन्होने अनेक रचनाएँ राष्ट्र प्रेम की
उत्कृष्ट भावना जगाने वाली लिखी है। इसके अतिरिक्त प्रकृति का आलंकारिक, मानवीकृत,
उद्दीपक और उद्देशिका स्वरूप भी प्रसाद जी के काव्य में
प्राप्त होता है।
प्रसाद जी की साहित्य शैली
में परम्परागत तथा नव्य अभिव्यक्ति कौशल का सुन्दर समन्वय दिखाई देता है। उसमें ओज, माधुर्य और प्रसाद-तीनों गुणों की सुसंगति है। प्रसाद जी की दृष्टि साम्यमूलक
अलंकारों पर ही हमेशा रही हैं। रूपक, उपमा,
उत्परेक्षा, प्रतीक आदि प्रसाद जी के प्रिय अलंकार थे। प्रसाद जी ने
विविध छन्दों के माध्यम से भावानुसार अभिव्यक्ति प्रदान की है। प्रसाद जी न केवल
हिन्दी साहित्य की अपितु विश्व साहित्य की विभूति है। प्रसाद जी ने भारतीय
संस्कृति के सन्दर्भों को प्रस्तुत किया तथा इतिहास के गौरव मय पृष्ठों को समक्ष
लाकर भारतीय हृदय को आत्म-गौरव का सुख प्रदान किया है।
जयशंकर प्रसाद जी ने जीवन की प्रत्येक अनुभूति को अपने संघर्षशील जीवन को साहित्य में ढाल कर खरा सोना कर दिया है। हिन्दी साहित्य की लगभग प्रत्येक विधा में सशक्त रचना करने वाले अमर रचनाकार और नारी के श्रद्धा रूप को समाज के सामने रखने वाले महान साहित्यकार है।
n सूर्यकांत सुतार ‘सूर्या’
दार-ए-सलाम, तंज़ानिया, इस्ट अफ्रिका
चलभाष: +२५५ ७१२ ४९१ ७७७
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