पुस्तक समीक्षा: सतरंगे स्वप्नो के शिखर (काव्य संग्रह)- डॉ. मधु सन्धु
सतरंगे स्वप्नो के शिखर (काव्य संग्रह) रचनाकार - डॉ. मधु सन्धु समीक्षक – सूर्यकांत सुतार ‘ सुर्या ’ कविता अपने एहसास और जज्बात को पेश करने का एक ख़ूबसूरत तरिका हैं जो कल्पना से होकर मस्तिष्क के जरिए कलम से कागज पर उतरती हैं। प्राचीन काल में कविता में छंद और अलंकारो को बहुत जरूरी माना जाता था लेकिन आधुनिक काल में कविताए छंद और अलंकारो से आजाद हो गई हैं। कविता में भाव तत्व को प्रधानता होती हैं। आज मुक्त छंद कविताओ की नदिया बह रही हैं। कुछ सपने ऐसे बुने जा रहे हैं जिनके लि९ए शब्दों की जरूरत नहीं बल्कि उनकी उडान ही काफी हैं। मन में हिलोर उठाने वाले रंग उंचाइयों तक पहुँचाने वाले ख़याल और अपनी मंजिल तक ले जाने वाले नाविक की जरूरत हैं और उन्हीं सतरंगी सपनो को अपने शिखर तक पहुँचाने का काम डॉ. मधु सन्धु जी की कलम कर रही हैं। उनकी हमेशा आकांक्षा रही हैं कि स्त्री पुरुष को आजादी होनी चाहिए अपने सपनो को साकार करने और ऊंची उडान भरने की। इसलिए कवयित्री कहती हैं। मेरी सोलह वर्षीय आकांक्षा हैं कि मैं फेमिना से मिस इंडिया चुनी जाऊ मिस वल्ड और मिस युनिवर्स बनकर विज्ञापन कि दुनियाँ मे...