पंडित विजयानंद त्रिपाठी : सांस्कृतिक एवं भक्तिमय साधना के युगबोधी साहित्यकार
https://hindisepyarhai. blogspot.com/2022/03/blog- post_16.html जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥ निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना॥ मित्रता के संदर्भ में रचि गई इस चौपाई से मनुष्य को यह ज्ञान प्राप्त होता है कि हर समय मित्रता निभाने वाले की भगवान हमेशा सहायता करते हैं। इस चौपाई को अपने जीवन में उतारने वाले हिंदी साहित्य के महान पुरोधा आदरणीय पंडित विजयानंद त्रिपाठी ने भी अपने जीवन में दूसरों के दुखों को समझकर हमेशा अपने लेखन से हिंदी साहित्य क्षेत्र में सांस्कृतिक भक्तिमय साधना कि अवधारणा की है। २ अक्टूबर , सन १८८१ में विजया दशमी के दिन काशी उत्तर प्रदेश में अवतरण हुए पंडित विजयानंद त्रिपाठी ने ' तुलसी साहित्य ' और ' रामचरितमानस ' का गहन अध्ययन किया था। रामचरितमानस हिंदी साहित्य का सर्वोत्तम महाकाव्य है। इसमें ध्वनि , अलंकार , रिति , दिव्यालोकित , और औचित्य का समन्वय हैं। ...