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Showing posts from March, 2022

पंडित विजयानंद त्रिपाठी : सांस्कृतिक एवं भक्तिमय साधना के युगबोधी साहित्यकार

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  https://hindisepyarhai. blogspot.com/2022/03/blog- post_16.html जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥ निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना॥ मित्रता के संदर्भ में रचि गई इस चौपाई से मनुष्य को   यह ज्ञान   प्राप्त होता है कि हर समय मित्रता निभाने वाले की भगवान हमेशा   सहायता करते   हैं। इस चौपाई को अपने जीवन में उतारने वाले हिंदी साहित्य के महान   पुरोधा आदरणीय   पंडित   विजयानंद   त्रिपाठी ने भी अपने जीवन में   दूसरों   के   दुखों   को समझकर   हमेशा अपने   लेखन से हिंदी साहित्य क्षेत्र में सांस्कृतिक भक्तिमय साधना कि अवधारणा की है।   २ अक्टूबर , सन १८८१   में विजया दशमी के दिन काशी उत्तर प्रदेश में अवतरण हुए पंडित   विजयानंद त्रिपाठी   ने ' तुलसी साहित्य ' और ' रामचरितमानस ' का   गहन अध्ययन   किया था। रामचरितमानस हिंदी साहित्य का सर्वोत्तम महाकाव्य है। इसमें   ध्वनि , अलंकार ,  रिति ,  दिव्यालोकित ,  और औचित्य का समन्वय हैं। ...

पौराणिक लोक कथाओं में महिला योद्धा - विरांगना झलकारीबाई कोरी

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  बुंदेले हरबोलो के मुख हमने सुनी कहानी खुब लडी मरदानी वह थी ,  झाँसी वाली रानी उपरोक्त पंक्तियाँ कानों पर पड़ते ही भारत की वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई अपने दत्तक पुत्र को पीठ पर बांधे घोड़े पर सवार हुई प्रति साक्षात रूप में आंखों के सामने आ पड़ती हैं। जिसे हम सभी छुटपन से जानते और सुनते आये हैं। लेकिन बुंदेलखंड के इतिहास में एक और महिला योद्धा वीरांगना का नाम बड़े ही आदर-सम्मान के साथ लिया जाता है जिसने अंग्रेज़ों के खिलाफ राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में समाज के सामने अपनी वीरता का सांस के अंतिम छोर तक लडाई का प्रमाण दिया है। यह महिला योद्धा कोई और नहीं वीरांगना झलकारीबाई कोरी थी जिसने १८५७ की पहली जंग-ए-आजादी में झाँसी की रानी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लडी थी। झलकारीबाई कोरी रानी लक्ष्मीबाई के पति राजा गंगाधर राव की सेना में एक सैनिक पूरनसिंह कोरी की धर्म पत्नी थी। झाँसी के पास भोजला गाँव में २२ नवम्बर १८३० को मेघवंशी दलित समाज में झलकारीबाई ने जन्म लिया। उनके पिता का नाम सदोवर सिंह और माता का नाम जमुनादेवी था। मां की मृत्यु उनके बचपन में ही हो गई थी। इस गाँव के अधिकांश लोग ब...